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रात के अंधेरो में बैठे....

When i was sat on wall of my hostel's roof lonely. In the black night. timing may be 01:00 AM. that time i wrote this poem....




रात के अंधेरो में बैठे,
आज फिर से यह दिल,
न जाने कहाँ खो गया,
यह सुने सुने रास्ते,
न जाने कहाँ मुझे बुला रहे,
इन रास्तो पे,
न कोई आता जाता,
फिर यह नजरे किसे ढुंढती....

यह ठंडी ठंडी फिजाये,
न जाने किसकी याद दिला रही,
यह महकी महकी खुशबू,

हाल-ए-दर्द स्टुडेण्ट का....



सर्दी में जल्दी उठता,
जाता क्लास में पढने,
नहीं आते उस दिन गुरूजी,
फिर विश्वास उठ जाता पढाई से,
एक दिन वो नहीं आते,
एक दिन हम नहीं जाते,
बस यूहीं पूरा सेमेस्टर निकल जाता हैं,
ऐ खुदा! कैसे सुनाऊँ,
हाल-ए-दर्द स्टुडेण्ट का.... 

गुरूजी कहते,
दिल लगाकर पढो बच्चो,
जरूर सफलता मिलेगी,
दिल तो एक दिन भी नही करता,