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मैं, मेरी तन्हाइयो से अक्सर, यही बातें किया करता हूँ....

i wrote some lines 4-5 months ago, when i feel very lonely.....

दूर हो रहा हूँ मैं सबसे,
या सब दूर हो रहे हैं मुझसे,
मैं अच्छा हूँ या बुरा,
एक बार बता दे मुझे,
मैं सबको समझने वाला,
आज खुद को न समझ पा रहा हूँ,
मैं, मेरी तन्हाइयो से अक्सर,
यही बातें किया करता हूँ....


अकेलेपन में देती तू साथ,

पन्ने

हमें भी कभी शौक था,
रोज डायरी लिखने का,
बस एक दिन तेजी से पलटे,
पन्ने मेरी ज़िन्दगी के,
कुछ पन्ने बतलाते,
जख्मो भरी स्याहीं से लिखे नगमे,
कुछ बतलाते,
उदासी सी फीकी स्याहीं से लिखे अफ़साने,
कोशिश की कुछ लिखूँ,
मोहब्बत के बारे में,
पर आंसुओ में गिले थे,
पन्ने मेरे दिल के,
उनके इंतज़ार में,
हम बस लिखते चले गये,
और वो आये भी तो,
खुद को बिना दिल का हवाला दे,
उड़ा दिए पन्ने हवा में,
अरे यारो! कितने कमबख्त निकले,
मेरे लिखे हर एक पन्ने,
उड़ते जा पहुंचे.
हर गली-मोहल्ले,
पहले से यह बदनाम मोहब्बत,
बेखबर न रही अब जमाने से,
जिसने उडाये थे हवा में पन्ने,
हम जा ठहरे गुनहगार उनके....

दूसरी दुनिया

न जाने मैं कहाँ चला जा रहा था| मौसम भले ही सुहावना था पर जिस रास्ते पर मैं चल रहा था वो कुछ रेगिस्तान सा प्रतीत हो रहा था| आस पास कंटीली झाड़ियाँ, चमकती रेत जिस पर आसानी से चला जा सकता था| दूर दूर कुछ पेड़ नजर आ रहे थे, तकरीबन हर पेड़ के बिच २०० मीटर का फासला होंगा| मैं धीरे धीरे आगे बढते हुए दायें बाएं देखे जा रहा था, इंसान तो दूर, पंछियों के उड़ने की भी कहीं आहट नही थी| थोड़ी देर में रास्ता चढ़ाव का रूप ले रहा था| मुझे ना जाने क्यूँ बस आगे बढ़ते जाना था| मैं यह सोच भी नही रहा था की आखिर मैं जा कहाँ जा रहा हूँ|
              थोडा और चलने के बाद मैं रुक गया, मेरे सामने दो रास्ते थे, मेरे सामने संकरा और मेरी दायीं तरफ चौड़ा| दोनों ही रास्तो के किनारे पर कंटीली झाड़ियाँ का घेराव था| मैंने बिना वक़्त बर्बाद किए संकरे रास्ते की तरफ बढ़ना शुरू किया जिसका चढ़ाव पहले के मुकाबले थोडा ज्यादा था| मैं चढाव पे बेझिझक चढ़ा जा रहा था, ना बाएं देख रहा था, ना दायें, ना ही कुछ सोच रहा था, बस चला जा रहा था| चढ़ाव खत्म होते ही मैं दायें मुडा, मेरे सामने उबड़-खाबड़ सा मैदान था| कहीं छोटे खड्डे, कहीं बड़े, वो ही कंटीली झाड़ियाँ, 200 मीटर के फासले पर पेड़| इधर-उधर कोई नजर नहीं आ रहा था| धीरे-धीरे आगे बढ़ने के बाद एक ऊँचे स्थान पर चढ़ा| वहाँ खड़े होकर आगे की तरफ नजर डाली तो नजारा बदल चुका था, छोटे-छोटे तालाब, उनके आसपास अब वो कंटीली झाड़ियाँ नही थी| दूर कोई बहुत पुराना सा किला नजर आ रहा था|
              तभी कुछ आवाज सुनाई दी, मैंने बिना पलक झपकाए पीछे देखा,

DBMS की बेवफाई




वो Dbms पढ़ा रहे थे,
हम उन्हें देख रहे थे,
वो लग रही थी,
Database के record जैसी,
मुझे बनना था,
उस record की primary key,
उनकी आँखों की table से,
मेरे दिल की table में,
एक अजीब सा नशा,

राजनीति से परे युवा


                              “आजकल के युवाओं को राजनीति से नफरत है, लेकिन राजनीति ही किसी देश का भविष्य तय करती है-चाणक्य| क्या यह पूर्णतया: सच हैं? सच ही होगा, आखिर चाणक्य जैसा इतना बड़ा विद्वान् गलत कैसे कह सकता हैं| सिर्फ चाणक्य ही नहीं बहुतो के मुंह से आपने यह सुना होगा| इसका सीधा तात्पर्य यह हुआ की देश का भविष्य इसलिए अँधेरे की और बढ़ रहा है क्यूंकि कोई भी युवा राजनीति में दिलचस्पी नही दिखा रहा और कोई दिखा भी रहा हैं तो सिर्फ कॉलेज-यूनिवर्सिटी चुनाव तक, फिर हर कोई यहीं कहता हैं की राजनीति एक गन्दा कीचड़ हैं, भाई पैर मत घुसैयो| 
        कोई डॉक्टर बनना चाहता हैं, कोई इंजीनियर, कोई शिशक, पर जब बात राजनीति की आए सब युवा पीछे हट जाते है| वर्तमान में ८५-९०% से ज्यादा नेता सीनियर सिटीजन की टिकट के साथ देश की गाड़ी चला रहे हैं| आखिर क्यूँ? चाणक्य की बात पर तो हर कोई अमल कर लेता हैं, पर बेवजह युवाओं को कठगरे में खड़ा करना भी कहाँ तक जायज हैं? मैं आपको अपनी एक छोटी सी घटना सुनाता हूँ, फिर शायद आप युवाओं पे दोष मढने से पीछे हटे| 
         मैं हर रोज की तरह उस दिन भी जोधपुर की रेलवे कॉलोनी के हनुमान मंदिर जा रहा था| मेरी नजरे सामने कम, अपने मोबाइल में ज्यादा थी, जो आज के हर नौजवान में यह खूबी