साकरियावास रेलवे स्टेशन



20 साल पुराना ‘साकरियावास रेलवे स्टेशन’, पहाड़ी गाँव साकरियावास से तक़रीबन 6 किलोमीटर नीचे तलहटी पर था. जहाँ दिन में सिर्फ एक साधारण-गाड़ी ‘रामगंज मेल’ ही दो बार रूकती थी. एक बार रामगंज शहर से आते वक़्त दोपहर 3 बजे तो दूसरी बार शहर को जाते वक्त रात 8:30 बजे. यूँ कहे कि वो इस गाँव की मुंबई-लोकल जैसी लाइफ-लाइन थी. शादी-ब्याह का सामान हो या उच्च-शिक्षा का सुदूर प्रावास या शहर-पलायन, सब उस रामगंज मेल की बदौलत ही संभव था. वैसे तो गाँव के लोग इतने हष्ट-पुष्ट थे कि 6 किलोमीटर का फासला पैर रमाते-रमाते पार कर लेते लेकिन धीरे-धीरे आधुनिकता ने किसी को नहीं बक्शा और 6-7 रिक्शे उस 6 किलोमीटर के फासले को नापने लगे.

उस अँधेरी रात की 8 बज रही थी और मेल आने में अभी आधा घंटा बाकी था. रात के वक्त कभी-कभी ही रिक्शे वाले मौजूद रहते थे सिवाय किसी त्योहार के. स्टेशन के बाहर 40 वर्षीय, काला, मोटा-तगड़ा गोकुल अपने रिक्शे में लेटा सुस्ता रहा था. अचानक किसी के कांपते हाथों ने उसके पैरो को झपटा मार तेजी से हिलाया और गोकुल चिल्लाता हुआ रिक्शे से बाहर उठ भागा. रिक्शे से दूर जाते-जाते उसके कानो में ‘पानी-पानी’ शब्द सुनाई पड़े. उसने पलटकर देखा.

रिक्शे के दूसरी तरफ दुबला-पतला यानि हड्डियों का ढांचा, आधा गंजा जिसके आधे बाल आसमान से बाते कर रहे थे, पसीने में तरबतर हांफ और कांप रहा था. भयानकता के जो भी मानक ईश्वर द्वारा तय किये गये हो वो उन सब पर खरा उतर रहा था. गोकुल उल्टे पाँव लौटा और उस अजनबी को पानी की बोतल दी.




भोपड़ी के प्यार से भी उठा सकता था...अब ताक मत...रिक्शे में बैठ कर अपना गला तर कर ले...राहत मिलेंगी

अजनबी ने बिना हिचकिचाहट उसकी सलाह का सम्मान किया और रिक्शे में बैठ गया. पानी पीकर मुंह धोया तो कुछ राहत मिली. धीरे-से शुक्रिया अदा किया. गोकुल इसी मौके की तलाश में था. कब राहत मिले और वो पूछताछ शुरू करे.

 “इतनी रात को कहाँ से दौड़ से लगा रहा था?

इतना सुनते ही अजनबी ने पानी की बोतल गोकुल के हाथ मे थमा खड़ा हुआ.

कुछ नहीं, चलता हूँ

ऐसे कैसे चला जायेंगा?...तेरी सेवा-चाकरी की है...और तुझे बताने में मौत आ रही है”

“ऐसा कुछ नहीं है, बताने का कोई फायदा नहीं”

“जात का बनिया हैं क्या?...जो फायदे-नुकसान की पहले सोच रहा है...शक्ल से तो नरेगा-वालो से भी गया-बीता लग रहा है”

“पहले नरेगा में ही काम करता था...फिर बस-ड्राईवर बन गया”

“तो अब क्या धावक बनने का इरादा है?”

“मेरे साथ जो हुआ?...मैं...बताऊंगा तो...तुम...यकीन...नहीं...करोंगे”-और लडखडाते शब्दों के साथ कहते-कहते उसकी सांस फूलने लगी और हाथ-पाँव कांपने लगे.

अच्छा ऐसी बात है...फिर तो आराम से बैठकर सुननी पड़ेगी-और गोकुल रिक्शे में बैठ गया-आ जा तू भी बैठ जा...क्या पता कहीं ठंडा न पड़ जाये?-अजनबी हिचकिचाते हुए उसके पास बैठा और कहानी सुनाना शुरू किया-

मेरा नाम पुष्कर है. मैं पड़ोसी गाँव भाखरपुर का रहने वाला हूँ. जैसा कि पहले जिक्र कर चूका कि मैं एक बस-ड्राईवर हूँ और उस पेशे के मुताबिक़ गाँव के मुखिया के बेटे की बारात लेकर रामगंज के लिये रवाना हुआ. एक किलोमीटर का फासला भी नहीं पार हुआ था कि बस बंद पड़ गयी. मैने 10 दफा चालु करने की कोशिश की लेकिन हर कोशिश नाकाम साबित हुईं. नीचे उतर कर एक-एक पुर्जा चेक किया, कहीं कोई खराबी नहीं थी. मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. फिर कुछ बारातियों ने बारी-बारी से बस चालु करने की कोशिश करने लगे. कोई सफल नहीं हुआ. मेरे साथ सबकी कोशिश और हिम्मत जवाब दे चुकी थी. आखिरकार सब बाराती बस से उतर गये और किसी को गाँव से दूसरी बस लाने के लिए भेजा.

एक घंटा बीतने को आया था पर दूसरी बस नहीं आयी. सीट पर बैठे-बैठे ही आँख लग गयी मेरी. अचानक किसी औरत की चिल्लाहट भरी आवाज सुन जागा. बस के आगे खुले हुए लम्बे बालो वाली एक अधेड़ औरत चोली-घाघरे में तांडव कर रही थी और सब बाराती उसके चारो तरफ हाथ जोड़कर खड़े थे. दुल्हे के दादा ने सलाह दी थी कि देवीय प्रकोप हो सकता है देवी से पूछा जाये. वो अधेड़ औरत जो स्वयं को देवी का रूप कहती थी. हर नवरात्रा मन्दिर प्रागंण में आरती शुरू होने के साथ ही उसका तांडव शुरू होता और फिर वो भक्तो की समस्याये सुलझाती. अंत में गंगाजल छिडककर व धुप-बत्ती करके उसे मनुष्य योनि में वापस बुलाया जाता. उसका तांडव चल रहा था और मैं बस के भीतर सीट पर बैठा थर-थर कांप रहा था.

मातारानी, हमसे ऐसी क्या भूल हुयी कि आज इस शुभ-कार्य में विघ्न पैदा हुआ-दादा बोले.

विघ्न तो होंगा ही...घर से निकलने से पहले देवी-देविताओ को याद करके नहीं निकलोंगे...तो विघ्न होगा ही-उसकी आवाज इतनी कर्कश थी थी कि मानो बस के शीशे टूट जायेंगे.

हमने तो सबको याद किया था और नारियल भी फोड़े थे

झूठ...सरासर झूठ...एक को भूल गए तुम सब

किसे मातारानी?

पिंटीया को

पिंटीया-सब बारातियों की जुबान पर उसका नाम था.

हाँ पिंटीया, बारात रवाना होने से पहले उसे याद नहीं किया तो वो क्रोधित होकर बस के बायें टायर से चिपका बैठा है-इतना सुनते ही बारातियों में हलचल हुई. पिंटीया, देवी के अलावा किसी को नहीं दिख रहा था. कुछ बाराती देवी की जय-जयकार करने लगे. कुछ चार कदम पीछे हट गये. कुछ देवी को गंगाजल से शांत करने लगे. दुल्हे की माँ टायर के सामने नारियल फोड़ दीया-धूप करने लगी. यह सब देख मेरी पतलून गीली होने ही वाली थी कि मैंने बस से नीचे उतर भीड़ का हिस्सा बनना मुनासिब समझा. बस के नीचे उतर मैंने बायें टायर की तरफ देखा तो-

5 साल का बच्चा जिसका पूरा शरीर नीला पड़ चूका था और आँखें एकदम खून-सी लाल, मुझे देखकर मुस्कुराया. मेरी जान गले में आ गयी और वहां से उल्टे पाँव भागा.

रिक्शे में पुष्कर ने अपनी कहानी खत्म की लेकिन गोकुल स्तब्ध-सा बैठा था. माथे पर पसीने की बूँदे ठहरी थी. तभी रामगंज मेल के हॉर्न के साथ ही वो चौंका. रामगंज मेल आहिस्ते-आहिस्ते स्टेशन को अलविदा कहने लगी. गोकुल ने स्टेशन के गेट की तरफ देखा. कोई यात्री नहीं उतरा था.

मैं तुझे साकरियावास छोड़ देता हूँ...रात किसी धर्मशाला में काट लेना...और कल सुबह अपने गाँव चले जाना-गोकुल ने अपने डर पर अंकुश लगाने के लिये बात को वहीँ विराम देना उचित समझा और रिक्शा चल पड़ा साकरियावास की तरफ.









3 महीने बाद...रामगंज शहर...



सुबह की 6 बज रही थी. 35 वर्षीय समाजसेवी राजीव शर्मा बैग कंधे पर लांघे रिक्शा स्टैंड की ओर चल पड़ा. राजीव सभ्य परिवार का अविवाहित अधेड़ था. उसने ग्रेजुएशन खत्म होती ही अपना जीवन समाज-सेवा को समर्पित कर दिया.

स्टेशन चलोंगे

डबल भाड़ा लगेगा

डबल क्यूँ?

शहर का पहला फ्लाई-ओवर बन रहा है...रास्ता बंद कर दिया है...अब पूरे रामगंज के चक्कर काटकर जाना पड़ेगा

10-20 ज्यादा ले लेना

डबल मतलब डबल


राजीव ने सब रिक्शा-वालो से पूछा, लेकिन कोई राजी नहीं हुआ. तभी पीछे से आवाज आई.

साहब, मेरे रिक्शे में बैठो...जितनी इच्छा हो उतना देना

थैंक यु...थैंक यु...-राजीव तेज कदमों से रिक्शे की तरफ चल पड़ा. रिक्शा-वाले ने रिक्शा चालु किया. राजीव उसकी इंसानियत की तारीफ़ करते हुए रिक्शे में बैठा और रिक्शा चल पड़ा स्टेशन के लिए.

नाम क्या हैं तेरा

गोकुल

अच्छे आदमी हो...खूब तरक्की करोंगे

शुक्रिया साहब...वैसे कौनसी ट्रेन पकड़नी है?

7 बजे की रामगंज मेल

साकरियावास जा रहे हो क्या?

तुम्हे कैसे पता?-राजीव चौंका.

साहब, मैं भी वहीँ का हूँ

ओह्ह्ह-राजीव को पहले से अच्छा महसूस होने लगा.

किससे मिलने जा रहे हो?

नहीं...मिलने नहीं...मेरे N.G.O. का कार्यक्रम है

N.G.O. मतलब?

मेरी एक संस्था है...जो गरीब...भूखे...निशक्तजनो की मदद करती है

साहब, आप भी अच्छे आदमी ठहरे

राजीव मुस्कुराने लगा.

एक बात बताये साहब आपको

बोलो

आप गुस्सा मत होना

मैं क्यूँ भला गुस्सा हूँ?

नहीं...वो क्या हैं ना...पढ़ा-लिखा जेंटलमैन टाइप आदमी ऐसी बातों पर जल्दी भड़कता है

कैसी बातें?

साकरियावास में देर रात तक बाहर मत घूमना

क्यूँ?-राजीव के कहते ही गोकुल ने जोर से ब्रेक लगाये.

क्या हुआ?

साहब, बिल्ली थी-और इतना कहकर राजीव की तरफ पलटा.

पिछले 2-3 महीनो से गाँव के लोगो आत्मा दिखाई देती है

सामने देख और रिक्शा चला

गोकुल ने रिक्शा दुबारा स्टार्ट किया.

साहब...मैंने कहा था ना कि आप गुस्सा हो जायेंगे

अब अगर एक शब्द बोला ना...

सुन तो लीजिये, साहब...मैं कौनसा आपको यकीन करने के लिए कह रहा हूँ?...और कहानी सुनते-सुनते रास्ता भी आराम से कट जायेंगा

राजीव ने इस बार कोई विरोध नहीं जताया और गोकुल ने कहानी सुनाना शुरू किया...

तीन महीने पहले मैं सकरियावास रेलवे स्टेशन और गाँव के बीच ही रिक्शा चलाता था. एक रात रामगंज मेल का इन्तजार करते-करते आँख लग गयी. तब एक युवक से मुलाकात हो गयी. पुष्कर नाम था उसका. बड़ा पागल आदमी था. उसने मुझे एक भूत पिंटीया की कहानी सुनाई. क्या बताऊँ साहब?, कहानी सुनकर मैं हँस-हँस कर लोटपोट हो गया. वो मुझे डरना चाहता था पर मैं एक परसेंट भी नहीं डरा और उससे कहा-

मैं तुझे साकरियावास छोड़ देता हूँ...रात किसी धर्मशाला में काट लेना...और कल सुबह अपने गाँव चले जाना


रिक्शा साकरियावास की कच्ची सड़क पर औसत गति से चल रहा था. पुष्कर शीशे में गोकुल को घूरे जा रहा था और शीशे में पुष्कर की शक्ल देख डर के मारे गोकुल का दम घुट रहा था.

तुमने पूछा नहीं...पिंटीया कौन था?-पुष्कर ने चुप्पी तोड़ी.

जानकार क्या करना हैं?...छोड़ो ना बात को-गोकुल ने बात से पल्ला झाडा. वो किसी भी हालत में बात बढ़ाना नहीं चाहता था. लेकिन पुष्कर कहाँ चुप रहने वाला था?

पिंटीया मानसिक बीमारी से ग्रसित दुल्हे का भाई था...उसकी मौत तीन साल की उम्र में घर के बरमादे में सांप काटने से हुयी थी...और फिर वह परिवार का पूर्बज बन गया

..तब से वो उनके घर में ही वास करता हैं

तू चुप होता हैं या रिक्शे से उतारू-गोकुल भड़का. पुष्कर ने कोई जवाब नहीं दिया.

तुझे डर लग रहा हैं क्या?

डर मेरी लुंगी में...ऐसी 353 कहानियां गाँव के हर एक बुजुर्ग की जुबान पर है...ऐसी कहानियां सुनते-सुनते ही बड़ा हुआ हूँ...मुझे डरा रहा है साला

पुष्कर मुस्कुराया.

रिक्शा गाँव की किसी पुरानी जर्जर धर्मशाला के सामने रुका. 9 ही बजी थी लेकिन पूरा गाँव सुनसान माहौल के चपेट में था.

उतरो...-पुष्कर, रिक्शे से उतर कर गोकुल को लाचार निगाहों से देखने लगा.

क्या?...भाड़ा नहीं हैं देने को...मुझे चाहिए भी नहीं

पुष्कर ने धर्मशाला की तरफ देख फिर गोकुल की तरफ देखा. गोकुल को समझने में देर नहीं लगी कि उसके पास रात रुकने का किराया नहीं हैं. गोकुल अपनी जेब से कुछ रूपये निकाल देने लगा कि चिल्लर जमीन पर बिखर गईं. गोकुल चिल्लर उठाने के लिए झुका...

साहब, मुझे 330 वोल्ट का झटका लगा और दूसरी तरफ जा गिरा...10 दिन तक होश नहीं आया

झटका...कैसा झटका?-राजीव को उसकी कहानी में मामूली-सी दिलचस्पी आने लगी थी.

गोकुल ने स्टेशन के बाहर रिक्शा साइड में लगाया. पलटकर राजीव के चेहरे के करीब मुंह लाकर धीरे-से कहा-

साहब...उसके दोनों पैर उल्टे थे

[कहानी अभी बाकी है]

[उल्टे पैर देखने के बाद गोकुल का क्या हुआ? क्या राजीव ने गोकुल की कहानी पर विश्वास किया? या आने वाला है कहानी में नया मोड़?  जाने के लिए पढ़ते रहिये "मण्डली" अगले रविवार सिर्फ Lines From Heart पर]

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