तेज रफ़्तार से हवा को चीरती हुईं जिप्सी ठीक से आकर रुकी भी नहीं थी कि चार गुंडे-मवाली किस्म के लोग हडबडाहट में उतरे. ड्राईवर के पास वाली सीट से जो गुंडे-मवाली किस्म का आदमी अभी-अभी उतरा था उसने पीछे से उतरे बाकी दो गुंडे-मवाली किस्म के आदमियों को इशारा किया. उन बाकी दो ने जिप्सी के पिछले हिस्से से एक बोरा उठाया और चले पड़े ड्राईवर के पास वाली सीट से उतरे गुंडे-मावली किस्म के आदमी के पीछे-पीछे. बोरे में कुछ हिल रहा था जो उस बोरे रूपी बंधन को फाड़कर आजाद होना चाहता था लेकिन इस बात से अनजान था की जिस बोरे में कैद है वो तो पहले से ही आजाद था क्यूंकि बोरे पर लिखा था “आजाद बासमती चावल”.
वे जिस शतिग्रस्त बंगले में दाखिल हुए थे वो शहर के मशहूर डॉन जीजी भाई का बसेरा था. आज से दो बरस पहले गैंगस्टर गोटिया नाम का शख्श अंडरवर्ल्ड डॉन सुलेमान टपोरी का दायाँ हाथ हुआ करता था जो लोगों को हँसा-हँसाकर मारता था. इसकी वजह थी जोकर. गोटिया को जोकर बहुत पसंद थे. वो शहर में सर्कस का एक भी शो नहीं छोड़ता था. उसके इस हँसा-हँसाकर मारने के तरीके से सुलेमान लोटपोट हो जाया करता था और एक दिन वो खुद भी हँसा-हँसाकर मारा गया. अक्सर लोग जीवन में जैसे-जैसे बड़े मुकाम हासिल करते जाते है उनके नाम शोर्ट हो जाते है इसलिए गैंगस्टर गोटिया का नाम भी शोर्ट बन गया जीजी भाई.
बंगले के अंदर दीवारों पे जगह-जगह कागज़ चिपकाएँ गए थे जिन पर लिखा था “यहाँ हँसना मना हैं”, “हँसोंगे तो मारे जाओगे”, “Beware to laugh” . एक कमरे के भीतर वे घुसे तो सामने सोफे पर एक और गुंडा-मवाली किस्म का आदमी सुस्ता रहा था. दाढ़ी थोड़ी बढ़ी हुईं थी और शक्ल उसके बीमार-परेशां होने की तरफ इशारा कर रही थी. जो ड्राईवर के पास वाली सीट से उतरा हुआ गुंडा-मवाली आदमी था उसने उस सोफे पर लेटे गुंडे-मवाली, बढ़ी दाढ़ी वाले आदमी के कान के पास जाकर धीरे-से कहा-

“भाई, हम उसे ले आये”
वो चौंकते हुए जगा और घबराहट भरी आवाज में बोला-“किसे?”
“जोकर!”

सोफे पर लेटे जीजी भाई ने हाफू को इशारा किया और हाफू ने उन बाकी दो गुंडे-मवाली आदमियों को जो बोरा पकडे खड़े थे. बोरा खुलते ही अंदर से रंग-बिरंगी पोशाक-मेकअप ओढ़े जोकर उछला. उसकी साँस फूलीं हुईं थी. वो हांफ रहा था. इधर-उधर देख रहा था. कमरे की दीवारों पर भी कागज़ चिपके हुए थे.



“पानी-पानी”-वो चिल्लाने लगा. हाफू ने उसके मुँह में बंदूक घुसेड़कर घुटनों के बल बिठाते हुए बोला-
“बारूद पीयेगा”
जोकर काँप गया.
“दे दे”-जीजी सोफे पर उठ बैठा था.
“क्या भाई?”-जोकर के मुँह में से बंदूक निकालते हुए हाफू बोला.
“पानी”

हाफू ने एक गुर्गे को इशारा किया. जीजी अपने पेंट-कमीज के जेबों में, सोफे पर इधर-उधर कुछ तलाश रहा था. हाफू ने उसके समीप जाकर बंदूक आगे की. गुर्गे ने जोकर को पानी का ग्लास थमाया. पानी पीने से उसे थोड़ी राहत महसूस हुईं.

“क्या चाहियें आप लोगों को मुझसे?...मुझे छोड़ दो...मैं बहुत शरीफ आदमी हूँ”-जोकर गिडगिडाने लगा.

जीजी ने बंदूक से इशारा करते हुए अपने पास बुलाया. वो घुटनों के बल डरते-डरते उसके पास गया.

“क्या...क्या...चाहिए....मुझसे?”
“तेरी हँसी”
“मेरी...मेरी हँसी”

जीजी ने हाफू की तरफ देखा और हाफू कमरे से बाहर निकल पास वाले कमरे में घुसा. पलंग पर 9 साल का बच्चा लेटा छत को घुर रहा था. आँखों से प्रतीत हो रहा था कि वो काफी डरा हुआ था. पास में एक औरत बैठी थी जो बच्चे के बालों में हाथ फेर रही थी. उसकी आँखें नम थी. चेहरे पर एक सदी पुरानी उदासी झलक रही थी. सामने टेलीवीजन पर डेली-सॉप चल रहा था जिसमें एक माँ अपने बेटे के साथ खेल रही है. हाफू को देखते ही उसने साड़ी का पल्लू ठीक किया और अपनी आँखें पौंछी.

“भाभी, वो भाई ने लल्ला को बुलाया है”
“अब तो बख्श दो...और क्या करना बाकी रह गया है?...सबकुछ तो कर चुके”-और वो बिलख पड़ी.
“भाभी, संभालो अपने आप को...एकदिन सब ठीक हो जाएगा...भाई से जितना हो सकता है उतना वो कर रहा हैं”
“मुझे कुछ नहीं सुनना...जाकर कह दो अपने भाई से...लल्ला नहीं आएगा”

हाफू मायूस लौटा. हाफू को लल्ला के बगैर आते देख जीजी सोफे से उठा और लल्ला के कमरे में पहुँचा. जीजी को कमरे में आते देख मालती की आँखे आवेश में लाल हो गईं. लल्ला ने भी डरी निगाहों-से अपने पिता की तरफ देखा. टेलीविजन के डेली-सॉप में पति-पत्नी के बीच तकरार का दृश्य चला रहा था. जीजी ने लल्ला को उठाने के लिए जैसे ही हाथ आगे बढाया कि मालती ने उसके हाथ को एक तरफ धकेल दिया.

ख़बरदार मेरे बेटे को हाथ लगाया तो  
यह मेरा भी बेटा है
बेटा था अब नहीं है
मुझसे मत उलझो मालती, प्लीज!
हर वक्त सही-गलत का फैसला करने वाले होते कौन हो तुम?
यह सवाल कभी मुझसे इस शहर ने भी नहीं पूछा...तो तुम होती कौन हो मुझसे यह पूछने वाली?
तुम्हारी अर्धांगिनी...तुम्हारी आत्मा का आधा हिस्सा
आधी हो तो आधी बनकर रहो, पूरा बनने की कोशिश मत करो-इतना कहते ही जीजी लल्ला को गोद में उठाया. मालती जीजी के हाथ से लल्ला को खींचने लगी. तभी एक कठोर प्रहार और मालती बेसुध होकर पलंग से नीचे जा गिरी.

जीजी ने लल्ला को जोकर के सामने पेश किया. लाल के हाव-भाव में कोई परिवर्तन नहीं थे. वो गर्दन नीचे किये खड़ा था.
इसे क्या हुआ है?-लल्ला को सहमा-सा देख जोकर ने पूछा.
उससे तुझे कोई मतलब नहीं...तेरा काम इसको हँसाना है-सोफे के कवर से बंदूक साफ़ करते हुए जीजी बोला.
मैंने अगर इसे हँसा दिया तो मुझे छोड़ दोगे ना
ह्म्म्म
और अगर नहीं हँसा पाया तो
तब भी छोड़ देगे-जीजी ने गहरी साँस ली. जोकर का चेहरा थोडा खुशनुमा दिखने लगा.
एक ग्लास और पानी मिलेगा

पानी पीते ही जोकर ने इतनी जोर से ठहाका लगाया कि मानो कमरे की चारो दीवारों भी हँसने लगी हो. वो अजीबोगरीब हरकते-चेहरे बनाकर लल्ला को हँसाने की पूरी कोशिश कर रहा था. कमरे में मौजूद सभी शख्श कभी लल्ला को तो कभी जोकर को देख रहे थे. काफी देर की कोशिश के बाद जोकर थक गया. वो नाकामयाब रहा लल्ला को हँसाने में. जीजी अपनी आँखें बंदकर सोफे पर ही फ़ैल गया.

एक जोकर होकर भी हँसा नहीं पाया, तो तू जोकर किस काम का-जीजी ने गुस्से में जोकर को ले जाने के लिए इशारा किया.
चल, चल, उठ-हाफू ने जोकर का हाथ पकड़ खड़ा किया.
मुझे छोड़ दिया ना
हाँ, हाँ, चल अब यहाँ से

हाफू, जोकर के साथ कमरे से बाहर निकला.

एक बात पुछू...नाराज मत होना...इस बच्चे को आखिर हुआ क्या है?-जोकर बोला.
जवाब जानना हैं ना तुझे
हाँ
बिल्डर से पूछ
कौन बिल्डर?

हाफू रुका.

बायीं तरफ जो कमरा दिख रहा है ना
हाँ
पूछकर...चुपचाप घर निकल जाना...ना किसी से कुछ कहना...ना कुछ पूछना
ठीक है, तो मैं जाऊ


हाफू ने गर्दन हिलाई. जोकर कमरे की तरफ बढ़ा. उसने दरवाजा धलेका. दरवाजा खुला ही था. वो कमरे के भीतर गया. उसके पाँव रुक गए. आँखे फटी की फटी रह गईं. उसने अपने हाथों से अपना नाक व मुँह दबोचा. वो पलटा. गोली चलने की आवाज और जोकर पीठ के बल बिल्डर और 7-8 जोकरों की लाशों के ऊपर जा गिरा. दरवाजे पर हाफू बंदूक ताने खड़ा था. एक कमरे में मालती पलंग के पीछे कोने में दुबकी सिसकियाँ ले रही थी. तो दूसरें कमरे में जीजी, लल्ला से लिपटा पश्चाताप कर रहा था.

दो महीने पहले...

...मुझे माफ़ कर दो जीजी भाई...हाहाहाहा...बहुत बड़ी गलती हो गईं...हाहाहाहा...आगे से शिकायत का मौका नहीं दूगा...हाहाहाहा
अबे चूतिये, तू हँस रहा है या हँसी की मिमिक्री कर रहा है...हँसने में भी शिद्दत होनी चाहिए
गलती हो गयी भाई...माफ़ी दे दो
ऐ हाफू, तू हँसा के दिखा रे इसको...हँसना आता नहीं...साला बिल्डर बना घूमता है

वो ही कमरा, वे ही लोग, बस जोकर की जगह बिल्डर, महौल ग़मगीन के बजाय खुशनुमा, दीवारों पर कुछ भी हास्य-निषेध नहीं चिपका हुआ था. जीजी अपने उस अंदाज में था जिस अंदाज़ के लिए वो जाना जाता था. हर बार की तरह आज भी वो ही अंडरवर्ल्ड की घिसी-पिटी  कहानी थी. जीजी ने बिल्डर से हफ्ता माँगा और बदले में बिल्डर ने जीजी की सुपारी दे दी. बिल्डर की मौत तय थी लेकिन जीजी सोचता था जिस तरह बकरे को हलाल करने से पहले खिलाया-पिलाया जाता है उसी तरह अपने दुश्मन को हँसा-हँसाकर खून बढ़ाकर स्वर्ग भेजना चाहिए.
एक तरफ हाफू खड़ा होकर जोर-जोर से हँसने की एक्टिंग कर रहा था. दूसरी तरफ जीजी उसकी कनपटी पर बंदूक ताने खड़ा था. बीच में बिल्डर बारी-बारी से दोनों तरफ मौत देख रहा था. बिल्डर जब जीजी की तरफ देखता तो जीजी बोलता हाफू की तरफ देख...देख, देख...हुबहू वैसा हँस के दिखा. बिल्डर जब हाफू की तरफ देखता तो दूसरी तरफ खड़ी मौत याद आ जाती और हँसने की बजाय आँखों से आंसू निकल आते.
हाफू ने हँसना रोक दिया और बोला भाई, अब और नहीं हँसा जाता...थक गया
धाड़...धाड़. हाफू के कहने की देर थी और जीजी के सुनने की. बिल्डर फर्श पर औन्धे मुँह पड़ा था. फर्श पर काफी खून काफी बहने लगा.
तभी हाफू की नजर दरवाजे पर पड़ी.

भाई...लल्ला

जीजी पलटा. दरवाजे पर उसका 9 साल का बेटा लल्ला खड़ा था. जिसकी आँखें आमतौर के मुकाबले थोड़ी बड़ी दिख रही थी. चेहरा पसीने में भीगा था. गर्मी के मौसम में भी वो काँप रहा था. उसकी नजरें फर्श पर बहते खून पर जमी थी. वो पलकें तक नहीं झपका रहा था. जीजी और हाफू उसके तरफ भागे. जीजी ने उसे गोद में उठाया. उसका शरीर तप रहा था.
वो दिन था और आज का दिन. लल्ला तब से न बोलता, न मुस्कराता. इतने करीब से गोली की आवाज और खून देख अंदर से पूरी तरह हिल चूका था. खौफ ने उसे अपने शिकंजे में बुरी तरह जकड़ा लिया था. जीजी लल्ला को डॉक्टरों, फकीरों, तांत्रिको के पास ले गया लेकिन सब जगह से उसे खाली हाथ लौटना पड़ा.
जब लल्ला पेट में था तब मालती जीजी से आने वाले बच्चे के बेहतर भविष्य की आजमाइश में लगी थी, लेकिन जीजी ने एक ना सुनी. फिर मालती, लल्ला को पिता की छाया से दूर रखने लगी. इस तरह हर रोज पति-पत्नी के बीच तकरार होने लगी लेकिन बिल्डर वाले हादसे के बाद दोनों ने एक घर में दो घर बना लिये.

एक दिन जीजी को किसी ने सलाह दी तुम जोकर की मदद क्यूँ नहीं लेते?...जोकर रोते हुए को भी हँसा देता है...क्या पता जोकर की हँसी से लल्ला के अंदर कुछ क्रिया होने लगे

...और फिर शुरू हुआ कारवाँ, जोकरों को अगवा कर लल्ला के सामने पेश करने का. चेहरे पर मेकअप, रंग-बिरंगे कपडे पहन, उलटी-सीधी हरकते करने वाला जोकर लोगों को दिल से हँसाता है, लेकिन लल्ला के समक्ष बंदूक की नोक पर जोकर की हँसी किसी गहरे कुएं के दलदल में जा छिपी थी जिसे वो बमुश्किल से निकाल पा रहा था. तब जोकर, जोकर नहीं लग रहा था वह जोकर के भेष में एक डरा हुआ बहरूपिया मात्र था. नतीजा शून्य निकला और हैवानियत भरा. कभी जोकरों को आदर्श मानने वाला जीजी बेटे के मोह में सनकीपन का शिकार हो चूका था. उसके लिए जोकर का मतलब हँसी से था और जो जोकर हँसा ना सके वो जोकर नहीं. इस तरह हर रोज हँसी मौत की नींद सो खामोश होने लगी.

[कहानी अभी बाकी है]
[क्या जीजी अपने लल्ला के चेहरे पर मुस्कराहट लाने में कामयाब हो पाएगा? या शुरू होगा बेटे के मोह में हँसी को खामोश करने का ख़ूनी खेल? जानने के लिए पढ़ते लिए 'जोकर' अगले रविवार सिर्फ Lines From Heart पर]
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