[जब जीजी की सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी थी, तभी शहर में नया जोकर दिखाई दिया. जो न हँसता था, न मुस्कुराता, न किसी से बात करता. बस अपनी धुन में गुम-शुम चला जा रहा था. लेकिन वो भी जीजी के आतंक से बच नहीं पाया. अब आगे]

आज उसकी ज़िन्दगी और मौत का फैसला उसकी हँसी पर होना था जो वो कब का भूल चूका था. उसका सिर अभी भी चकरा रहा था. काफी देर जीजी, हाफू ने इंतज़ार किया उसके बोलने का, अन्य जोकरों की तरह पूछने का कि मैं कहाँ हूँ?, मुझे यहाँ क्यूँ लाये हो?. वो कुछ नहीं बोला. जीजी की तरफ बिना पलकें झपकाए देख रहा था. जीजी ने हाथ में रिवाल्वर को घुमाते हुए वो ही दोहराया जो हर बार बेटे के मोह में दोहराया करता है.
जीजी ने हाफू को इशारा किया और चंद पलों के पश्चात लल्ला कमरे में दाखिल हुआ. साथ में मालती भी थी. जीजी अचंभित-सा खड़ा हुआ लेकिन मालती ने उसे तवज्जो नहीं दी. लल्ला को जोकर के सामने खड़ा किया. आज पहली बार कमरे में मालती भी मौजूद थी. डर की कैद में कंपकंपाता लल्ला गर्दन नीचे किये खड़ा था. जोकर उसकी आँखों में देखना चाहता था लेकिन वो बार-बार अपनी नजरें चुरा रहा था. सबकी नजर जोकर पर थी शायद यह उनकी आखिरी उम्मीद थी. जोकर ने लल्ला का मुँह पकड़कर उसकी आँखों में देखा. जोकर उसकी आँखों में इतनी पैनी नजर से देख रहा था मानों जेहन में डर ढूंढ रहा हो. लल्ला का पूरा शरीर कांप रहा था.

अचानक जोकर मुस्कुराया. कितने दिनों बाद उसके होंठो एक अमिट मुस्कराहट थी. शायद वो उसकी आँखों में डर ढूंढने में कामयाब हो चूका था. ....और जोकर ने हँसना आरम्भ किया. वो लल्ला कि आँखों में आँखें दाल हँस रहा था. डर को सुना रहा था कि अब तेरा अंत निश्चित है. लल्ला मानो कडाके की ठंड में ठिठुर रहा हो. जीजी लल्ला की कंपकंपी नही देख पा रहा था. उसने नजरें फेर ली. बिना पलक झपकें जोकर ने एक संगीतकार की तरह ताल बदली. एकाएक उसका हँसना, रोने में तब्दील हो गया. दिल खोलकर हँसने वाला जोकर आज दिल खोलकर रो रहा था. पूरे कमरे में मातम छा गया. किसी को कुछ समझ में नही आ रहा था यह हो क्या रहा है? जोकर फुट-फुटकर चिल्ला-चिल्लाकर रो रहा था और लल्ला का पूरा शरीर लावे कि तरह ताप रहा था. साँसे तेज चल रही थी. जोकर की आँखों से निकलते आंसू मेकअप पर रास्ता बना रहे थे, वो ही रास्ता जिस पर से गम गुजरकर मेकअप के पीछे जा छिपे थे.
...और लल्ला माँ चिल्लाते हुए मालती जा चिपका. मालती ने एक बार जोकर को देखा. उसकी आँखों में ख़ुशी के आंसू थे और फिर लल्ला को अपनी छाती में समा लिया. जीजी खुश हुआ पर इस ख़ुशी में वो बात नहीं थी, पापा शब्द सुनने को कान अभी भी तरस रहे थे. हाफू ने जोकर के पास जाकर पीठ पर हाथ रख दिलासा दी और जोकर ने रोना बंद कर दिया.

बेटा, मैं कौन...?-यह कहते-कहते जीजी मालती की तरफ बढ़ा और मालती लल्ला को गोद में उठाये वहाँ से चली गयी. जीजी बस देखता रह गया, उसके शब्द उसके अंदर ही समां गए.
अबे भेन्चोद, पागल हो गया है क्या?-हाफू की आवाज से जीजी का दरवाजे से ध्यान भटका. सामने जोकर रिवाल्वर ताने खड़ा था.
ऐ, ऐ, गोली मत चलाना-जीजी ने भी अपनी रिवाल्वर जोकर की तरफ तानी. बाकी गुर्गो ने भी सिवाय हाफू के. उसकी रिवाल्वर जोकर के हाथ में थी और वो हाथ खड़े किये गालिया बक रहा था.

अपने कमरे में मालती बैग में कपडे डाल रही थी.

मैं कह रहा हूँ बंदूक नीचे कर-जीजी की बात खत्म होने की देर थी और जोकर ने गोली चला दी.

मालती कमरे से बैग लेकर निकली ही थी कि गोली की आवाज सुनकर उसके कदम रुक गये. आँखें भर आयी. लेकिन वो लल्ला के साथ ताज कदमों से आगे बढ़ी.
बाकी गुर्गो ने धडाधड जोकर पर गोलियां बरसायी. जोकर फर्श पर गिर पड़ा और हाफू ने उसके हाथ से रिवाल्वर छिनी. जीजी दीवार के सहारे झख्मी बैठा था. दाएँ कंधे पर गोली लगी थी. हाफू ने पहले जीजी को संभाला-भाई, तुम ठीक तो हो. उसे उठाकर सोफे पर लिटाया. फिर जोकर के पास गया. जोकर अभी मारा नहीं था. आखिरी साँसे चल रही थी.

पानी लेके आओ जल्दी-हाफू ने चिल्लाकर एक गुर्गे से कहा. गुर्गा पानी लाकर जोकर को पिलाने लगा.

भोसड़ी के, पिलाना नहीं है, मेकअप धो साले का-गुर्गा पानी से उसका चेहरा धोने लगा.
पता तो चले, किस हरामजादे ने घर में घुसकर भाई को ठोका है?
भाई, यह तो मनोज है-गुर्गा बोला और हाफू के चेहरे का रंग उड़ गया. जोकर की साँसे अभी भी चल रही थी.


अबे साले तू जिंदा कैसे बच गया?...मैंने तुझे गोली मारी थी ना-हाफू जोकर के मुँह को पकड़-पकड़कर पूछ रहा था. सोफे पर जीजी बेहोश हो चूका था.
बोल हरामी
अबे बोल ना
मा...मा...-जोकर कुछ बताने की कोशिश कर रहा था.
क्या मा...मा...मादरचोद, जल्दी बोल
मालती-आखिरी साँस के साथ आखिरी शब्द छोड़ गया था जोकर.
मालती भाभी!

बाहर कार स्टार्ट होने की ध्वनि सुनाई पड़ी जो धीरे-धीरे दूर जाती ओझल हो गईं.

[हाफू ने पैर से मनोज का शरीर हिलाकर देखा-मर गया साला. पलंग पर उसके बेटे राजू के मुँह से भी झाग निकल रहे थे. लगता है बेटा भी लुढका-इतना कहकर हाफू और उसके गुर्गे लौट गयें. तक़रीबन आधे घंटे के बाद मनोज की आँख खुली. वो इतनी देर से बेहोश था. उठने की कोशिश में दर्द से कराह उठा. रेंगते-रेंगते बमुश्किल राजू के पलंग तक पहुँचा. पलंग को पकड़ते हुए खड़ा हुआ और राजू के मुँह पर झाग देख वो पीठ के बल फर्श पर गिर पड़ा. कुछ मिनटों तक सदमे में वैसी ही स्थिति में पड़ा रहा. सदमें का असर कुछ कम हुआ तो लड़खड़ाते हुए पलंग के पास आकर राजू को मौत की नींद से जगाने का असफल प्रयास करने लगा.

राजू बेटा उठ जा
तुझे कुछ नहीं होगा
तेरे मुँह से तो ऐसे झाग निकले है-और पलंग की चद्दर से उसका मुँह पोंछने लगा.
उठ जा बेटा, उठ जा-और दहाड़ मारकर रोने लगा.

रोते-रोते कब बेसुध होकर फर्श पर गिर पड़ा उसे पता ही नहीं चला. चंद मिनटों में ही होश लौट आया था लेकिन मनोज ज़िन्दगी जीने का होश खो चूका था. लड़खड़ाते, दर्द में कराहते बाथरूम में गया और वापस लौटा तो हाथ में फिनाईल की बोतल थी. पलंग पर चढ़ अपने बेटे के समीप लेट गया. उसने राजू के गाल को चूमा और फिनाईल अपने होंठो से लगाने ही वाला था कि एक आवाज घर कि चारदीवारी से टकराकर गूंजने लगी...
रुक जाओ-घर कि चौखट पर मालती खड़ीं थी. मालती ने तेजी-से उसके करीब आकर फिनाईल की बोतल खिंच बाथरूम की तरफ फेंकी. मनोज हक्का-बक्का-सा उसे देखने लगा. उसने इससे पहले मालती को कभी नहीं देखा था.

तुम इतनी आसानी से अपनी ज़िन्दगी खत्म नहीं कर सकते...तुम्हे बदला लेना होंगा...हँसी का बदला हँसी से...जोकर का बदला जोकर से...तुम्हे फिर-से जोकर बनना पड़ेगा

उसने लल्ला को वापस पाने और जीजी को लल्ला से दूर रखने के लिए मनोज का इस्तेमाल किया था. वो जीजी के सामने जोकर की हँसी द्वारा लल्ला का इलाज कराने की तरकीब के खिलाफ जरुर थी लेकिन अंदर ही अंदर वो इसका समर्थन करती थी. क्यूंकि उसे भी जोकर पसंद थे. वो जीजी के साथ कई दफ़ा रामोजी सर्कस जा चुकी थी और उस जोकर की बहुत बड़ी फैन थी जो असल में मनोज था. उसे हाफू द्वारा खबर मिली कि मनोज और उसका बेटा मर चुके है, फिर भी वो मन में एक उम्मीद लिए मनोज के घर पहुंची थी. उसने कहीं पढ़ा था की जिस बिंदु पर आकर हँसी और दर्द मिलते है, उस बिंदु में ऐसी दिव्य शक्ति का संचार होता है कि मृत शरीर के भीतर भी सोयी हुईं रूह को जगाया जा सकता है. बस उसे अपने लल्ला के लिए ऐसी ही तो दिव्य शक्ति कि जरुरत थी]

मालती शहर से काफी दूर निकल चुकी थी. वो इस बात से अनजान थी कि जोकर और जीजी का क्या हुआ?

अगले दिन....

जीजी की तबियत में हल्का-सा सुधार हुआ था लेकिन दाएँ कंधे पर घाव अभी भरा नहीं था. वो घर में कहीं दिख नहीं रहा था. बाथरूम के एक कोने में नग्न बैठा था. आँखें गहरी लाल थी और चेहरे पर मालती, लल्ला को खोने के दुःख से भी ज्यादा मनोज को खोने का मातम था जिसने उसके बेटे को नईं ज़िन्दगी दी थी. जिस तरह वो नग्न था उसी तरह उसकी आँखों के सामने बिना लिबास के नग्न जोकर हँसी के करतब दिखा रहे थे. वो आँखें बंद करना चाहता था लेकिन चाहकर भी नहीं कर पा रहा था. शायद यह पश्चाताप का समय था.

पता चला अगले दिन शहर में नया जोकर आया है जो अपना दायाँ कंधा झख्मी होने के बावजूद भी लोगों को दिल खोलकर हँसा रहा है.

एक महीने के बाद...किसी शहर में...

मालती और लल्ला बस स्टॉप पर बैठे बस का इंतज़ार कर रहे थे.
मम्मी, वो देखो जोकर

अपनी तरफ बच्चे को उंगुली करता देख जोकर मजाकिया अंदाज में दौड़ते हुए उसके पास आया. लल्ला उत्साहित हो गया. जोकर ने उसे कुछ मजाकिया करतब दिखाये. मालती और लल्ला खूब पेट पकड़-पकड़कर हँसे. जैसे ही जोकर वापस जाने को मुड़ा...

मम्मी, आज पापा अपने साथ होते तो वो भी कितना हँसते ना?

जोकर रुक गया. आँखें भर आयी. कितने महीनों बाद आज उसने पापा शब्द सुना था. मालती के पास लल्ला की बात का कोई जवाब नहीं था.

मम्मी, अपन पापा के पास कब जायेंगें?
जिस दिन तेरे पापा सुधर जायेंगे

जोकर अपने आंसू पौंछ आगे बढ़ा.

समाप्त!

[भूत, प्रेत, आत्माओ के बारे में आपकी क्या राय है? बचपन से लेकर अब तक बुजुर्गो, मित्रो, अखबारों से जो किस्से सुने थे. उनमें से ही कुछ किस्सों को मिलाकर रची गईं है कहानी "मण्डली". अगले रविवार सिर्फ "Lines From Heart" पर]
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