[गैंगस्टर गोटिया उर्फ़ जीजी भाई अपने बेटे लल्ला के होंठो पर मुस्कराहट लाने के लिए जोकरों को को अगवा करने लगा, लेकिन कोई भी जोकर लल्ला को हँसाने में सफल नहीं हो सका और हँसी मौत की नींद सोने लगी. अब आगे]
 
जीजी के बंगले से 2-3 किलोमीटर की दूरी पर कोई मनोज रहता था. कुछ साल पहले शहर के ‘रामोजी सर्कस’ की लोकप्रियता में उसकी हँसी का खासा योगदान था. यह बात बहुत कम लोगों को मालूम थी कि रामोजी सर्कस का जोकर मनोज है. एक दिन बस दुर्घटना में पत्नी चली बसी लेकिन नसीब से 10 साल का बेटा बच गया. बच तो गया मगर तब से बीमार रहने लगा, कभी पीलिया, कभी टायफाइड, कभी सर्दी-जुकाम, कभी खांसी. सर्कस के शो तो अलग-अलग शहरोँ में होते थे, बीमार बेटे को लेकर आखिर कहाँ-कहाँ घूमता? दूसरा कोई रिश्तेदार भी नहीं था जिसके भरोसे उसे छोड़ा जा सके. आख़िरकार बच्चे की देखभाल के खातिर सर्कस छोड़ना पडा. जीने की उम्मीद तो पत्नी की आखिरी साँसों के साथ ही उड़ चुकी थी लेकिन अपने बेटे के लिए उसे जीना था. उसने किसी किराने की दूकान पर काम करना शुरू कर दिया. महीने की कमाई दो वक्त रोटी और बेटे की दवा के लिए काफी थी.



मनोज के सच की भनक जीजी के गुर्गो को लगी. जीजी भी रामोजी सर्कस के जोकर का बहुत बड़ा फैन हुआ करता था. उसके दिल में हल्की-सी उम्मीद जगी. मनोज जरुर लल्ला को ठीक कर देगा. हाफू जीजी को मनोज के बारे में बतलाकर कमरे से बाहर निकला तो सामने मालती खड़ी थी.

क्या हुआ भाभी?
कौन है यह नया जोकर?
भाभी, वो याद है आपको, हम रामोजी सर्कस जाया करता थे, आपकी शादी के दो दिन बाद ही तो गयें थे
रामोजी, अपने घर में भी कोई कम सर्कस नहीं हुआ है, सब याद हैं मुझे
उसी सर्कस का जोकर है मनोज, यहीं पास ही रहता है
पास में कहाँ?

रात के तक़रीबन 8 बज रहे थे. मनोज मेडिकल से दवाई लेकर सड़क पार कर रहा था. अचानक हाफू और उसके गुर्गो ने उस पर धावा बोल दिया. अगवा कर लिया. दवाई की शीशी सड़क पर बिखरी, फैली थी. जिसकी हर एक बूंद में पिता के इंतज़ार में कम्बल ओढ़े लेटे बच्चे की आकृति तैर रही थी.
वैन जीजी के बंगले के बाहर रुकी. मनोज के मुँह में कपडा ठुंसा हुआ था. गुर्गो ने दोनों कंधे अपने काबू ले रखे थे. वो हाथ-पाँव मार रहा था. उसकी नजरें भी दीवारों पर चिपके कागजों से चिपकने लगी थी. कुछ कदमों के बाद सब जीजी के कमरे में थे. जीजी मनोज को काफी देर तक घूरने लगा. जीजी जोकर के मेकअप के पीछे छिपे चेहरे से पहली बार मुखातिब हुआ था. अपने जैसा ही तो था बस मेकअप और कपडे उसे जोकर बना अलग-थलग कर देते है. जीजी के इशारे का इंतज़ार था और मुँह से कपडा निकाला गया.

मुझे यहाँ क्यूँ लायें हो?...मुझे घर जाना है...मेरा बेटा बीमार है
भाई का बेटा भी बीमार है-हाफू बोला.
तो उसमें मेरी क्या गलती है?
तेरी नहीं तो और किसकी है?...तेरी बिरादरी वाले उसका इलाज नहीं कर सके...तो कसूरवार में तेरा हिस्सा भी तो आता हैं न
क्या कसूरवार?...क्या बिरादरी?...मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है... मुझे जाने दो...मेरा बेटा घर पर अकेला है

जीजी सोफे से उठ मनोज के करीब आया और शालीनता से बोला.

मेरा एक बेटा है...9 साल का...वो बोलता नहीं, हँसता नहीं...तू बहुत अच्छा जोकर है...रामोजी सर्कस के बहुत शो देखे मैंने...उसे ठीक कर दे
तुम्हारी परेशानी समझ सकता हूँ...लेकिन अभी मेरा बेटा भी घर पर इंतज़ार कर रहा है...वो भी बीमार है...अभी जाने दे दो...कल मैं वापस आ जाऊँगा
क्या मेरा, मेरा, मेरा कर रहा है...गीता नहीं पढ़ी क्या?...मेरा बेटा, तेरा बेटा...मेरा बेटा, मेरा बेटा...ऐ हाफू, समझा रे इस सेल्फिश को

दरवाजे के पीछे से मालती सारा माजरा छिपकर देख रही थी.

भाई तेरा बहुत बड़ा फैन है...फैन का रेस्पेक्ट तो करना चाहिए ना...15 मिनट का काम है...फिर तू और तेरा बेटा खुश...भाई और लल्ला खुश
जिस दिन जोकर का काम छोड़ा था...उसी दिन मेरे अंदर का जोकर मर गया था...मैं तुम्हारे लल्ला को नहीं हँसा पाऊंगा...मुझे माफ़ करो-इतना कहकर मनोज पलटा.
अबे साला जाता कहाँ है?-हाफू उसकी ओर लपका और घूंसे बरसाने लगा.
यहाँ लोग आते हमारी मर्ज़ी से और जाते भी हमारी मर्ज़ी से
जीजी भाई का काम नहीं करेगा....इतना बड़ा जोकर हो गया

अपने बचाव में मनोज हाफू को धक्का देकर भागा. हाफू और बाकी गुर्गे उसके पीछे भागे. चूहे-बिल्ली की दौड़ छोटी-संकरी गलियों से बाजार होते हुए सड़कों पर आ गयी फिर दुबारा संकरी गलियों में सिमटने लगी. हाफू ने बंदूक से 5 गोलियां दागी पर निशाना हर बार खाली रहा. मनोज घर के दरवाजे को धक्का देकर अंदर घुसा ही था कि इस बार हाफू का निशाना अचूक निकला. गोली सीने को आर-पार कर गईं. मनोज गिर पड़ा. हाफू ने पैर से शरीर हिलाकर देखा-मर गया साला. पलंग पर उसके बेटे के मुँह से भी झाग निकल रहे थे. बेटे के दुःख में जीजी की बेरहमी ने दो और लोगों की जान ले ली जिसमें एक लल्ला का हमउम्र था.

एक शाम किसी निर्माणाधीन बिल्डिंग की छत की पाल पर लेटा जीजी दारु पी रहा था. आँखें नम थी. हाफू उसे ढूंढ़ता-ढूंढ़ता आता है.

भाई, तुम यहाँ बैठे हो...सुबह से पूरा शहर छान मारा...घर पर भाभी कितना परेशां हो रही है
झूठ मत बोल हाफू...झूठ मत बोल-जीजी नशे में बोल रहा था.
भाई, पहले तुम नीचे उतरो...नशे में कुछ अनहोनी न हो-हाफू, जीजी को पाल से नीचे उतार पाल के सहारे बिठाता है.
मेरे बेटे से बड़ी अनहोनी मेरे लिए और क्या हो सकती है?"-हाथ में पकडे पैग को सामने सिंटेक्स की टंकी पर मारते हुए बोला
भाई, सम्भालो अपने आप को
पापा सुनने को दिल बहुत ललचा रहा है-कहते-कहते जीजी, हाफू से लिपट गया और फुट-फुटकर रोने लगा. हाफू की आँखों में भी आंसू आ गए. उसने पहले अपनी आँखें पोंछी और जीजी को अपने से अलग कर उसकी आँखें पोंछते हुए बोला-
भाई, शहर के सारे डॉक्टर, हकीम, फ़कीर, तांत्रिक, जोकर...सब आपके कदमों में पेश कर दिये...अगर फिर भी कोई पाताल में छिपा बैठा हैं तो....यह हाफू उसे पाताल से निकाल कर आपके सामने ले आयेगा

जीजी हाथ में बोतल पकडे लड़खड़ाते हुए खड़ा हुआ.

कोई ऐसा डॉक्टर, जोकर नहीं बचा है जो मेरे बेटे को ठीक कर सके...हैं कोई ऐसा इस दुनिया में-आसमान की तरफ बोतल फेंकते हुए जीजी चिल्लाया.

...और अगले दिन शहर की सडकों पर एक जोकर दिखाई दिया.
वो जोकर के भेष में जोकर नहीं लग रहा था. हँसी, मुस्कराहट से नदारद मानो जोकर के भेष धरने का मकसद मात्र तन ढकने से था. बच्चों की टोली उसके संग चलते उछल-कूद कर रही थी. उन मासूम आँखों में इंतज़ार था जोकर के मनोरंजन का लेकिन उसे देखकर ऐसा लग रहा था कि वो स्वयं उस वक्त मनोरंजन की जरुरत कर रहा हो. हँसाना, मुस्कुराना तो दूर वो किसी भी तरह की कोई प्रतिकिया तक नहीं दे रहा था. बच्चे शोरगुल करते उसकी पतलून खींचे जा रहे थे और उसने अपना हाथ हिलाना भी मुनासिब नहीं समझा.
वो गुमशुम, खामोश अपनी धुन में चला जा रहा था. कुछ वक्त बाद बच्चों का इंतज़ार जवाब दे गया. एक-एक करके सब उदास मन से उल्टे पाँव लौटने लगे.

ऐसा कोई जोकर होता है...गन्दा, बेवकूफ कहीं का-एक बच्चे ने जाते-जाते गुस्से में कहा.


शहर में यह बात आग की तरह फ़ैल गयी की नया जोकर आया है, फाटे-पुराने, मैले-चीथड़े कपडे पहने, जो न हँसता है, न किसी से बात करता है, बस अपनी धुन में घूम रहा है. जगह-जगह बिना मुस्कराहट वाले जोकर के चर्चे होने लगे. वो जहाँ से गुजरता वहाँ लोगों कि भीड़ इकठ्ठा हो जाती. जब वो सर्कस में मनोरंजन करता था तब भी लोगों के दिल में इतनी सहानुभूति नहीं थी जितनी आज थी. हर कोई उसकी चुप्पी का राज जानना चाहता था पर उसने एक बार भी अपना मुँह नहीं खोला.
धीरे-धीरे लोगों कि सहानुभूति काल्पनिक सोचों में परिवर्तित होने लगी. किसी को वो पागल लग रहा था, तो किसी को गूंगा-बहरा, कोई उसे दुखों का सताया समझ रहे थे, तो कुछ नेता किस्म के लोगों ने उसे बहरूपिया घोषित कर दिया कि जोकर के भेष में शहर को लुटने आया है.
भोर का वक़्त था. वो एक पार्क के पास से गुजर रहा था. सहसा उसने बहुत-से लोगों के हँसने की आवाज सुनी. उसके कदमों ने पार्क के भीतर रुख किया. 10-12 बूढ़े लोग घेरा बनाकर हास्य क्रिया कर रहे थे. जोकर उन्हें घूरने लगा. आज उसके सामने कई जोकर मौजूद थे फर्क था सिर्फ मेकअप व कपडों का. वो सोच रहा था जब एक जोकर ने हँसना-हँसाना छोड़ दिया तो लोगों ने स्वयं ही जोकर बनना मुनासिब समझा. आखिर जोकर को हँसने का माध्यम कब तक बनाये रखेंगे लोग?
तभी एक बूढ़े महाशय जो सबसे ज्यादा उम्र में लग रहे थे, बोले-और जोर-से हँसो...स्वास्थ्य अच्छा रहेगा
एक पल में सारी धारणाएँ गलत सिद्ध हो गयी. हँसी में भी स्वार्थ छिपा है...स्वस्थ्य रहने का. आज उसे पहली बार जोकर के मेकअप का राज पता चला. उसके जीवन में कितने भी दुःख, दर्द हो, वो उन्हें मेकअप कि आड़ में छिपाकर बस हँसता रहता है. इस झूठी हँसी से शरीर को स्वस्थ्य हो जाएगा, लकिन आत्मा को स्वस्थ्य कैसे रखोंगे?
जोकर की आँखों में आँसू आ गए. वो स्वयं भी तो उस वक़्त मेकअप में था फिर वो अपने गमों को क्यूँ नहीं छिपा पाया? तभी बूढ़े लोगों कि हँसी ने उसके कानों पर दस्तक दी. उसने अपने हाथों से कसकर कान बंद कर दियें और भागा. उस हँसी से जितना दूर भाग सकता था उतना दूर.
सड़क के किनारे चाय की थडी के पीछे बैठा वो सुस्ता रहा था. आँखें भिंची हुईं थी. अचानक आँखें खुली तो उसने देखा एक 7-8 साल का बच्चा चुपके-से उसे घूर रहा है. जोकर को अपनी तरफ देख बच्चा भाग गया. जोकर ने दुबारा आँखें बंद कर दी. कुछ देर बाद वापस खोली तो बच्चा सिक्को से भरी हथेली उसकी तरफ किये खड़ा था. जोकर कभी सिक्को को तो कभी बच्चे को देख रहा था. दोनों एक-दूसरे के बोलने की प्रतीक्षा कर रहे थे. आख़िरकार बच्चे ने पहल की.

तुम सर्कस वाले जोकर हो ना...-जोकर का जवाब ना पाकर बच्चे ने अपनी बात जारी रखी.
...मुझे सर्कस देखना बहुत अच्छा लगता है...सबसे ज्यादा तुमको...जोकर को...
...लेकिन...-बच्चा के चेहरे पर उदास उतर आयी.
...मेरे मम्मी-पापा बहुत पैसे वाले है...लेकिन उनके पास वक्त नहीं है मुझे सर्कस दिखाने ले जाने का...
...आज भी मैदान में सर्कस का शो है...मैंने बहुत जिद की...बहुत रोया...लेकिन कोई लेकर नहीं गया...
तुम भी तो जोकर हो ना...क्या तुम मुझे सर्कस दिखाओगे?...
...मुझे नहीं पता सर्कस का टिकट कितना होता है?...मेरे पास थोड़े-से सिक्के है...तुम इन्हें रख लो...और मुझे यहीं सर्कस दिखा दो प्लीज!

बच्चे के आखिरी शब्द खत्म होते ही जोकर ने दूसरी तरफ मुँह फेर लिया. उसमें हिम्मत नहीं थी बच्चे से नजरें मिलाने की. आज सरे-बाजार उसकी बोली लगाईं जा रही थी, वो भी एक मासूम बच्चे द्वारा चंद सिक्कों में. कुछ देर इंतज़ार करने के बाद जब जोकर उसकी तरफ नहीं पलटा तो बच्चे ने सिक्को को वहीँ जमीन पर फेंक दिये. सिक्को की खनखनाहट सुन जोकर ने उसकी तरफ देखा. वो मायूस लौट रहा था. जोकर की नजर उस पर से नहीं हट रही थी. थडी से काफी दूर निकल चूका था लेकिन नजरों से ओझल नहीं हुआ था. जोकर ने जमीन पर बिखरे सिक्को को इकठ्ठा किया और उस बच्चे की तरफ दौड़ा.
अचानक किसी गाडी ने आकर उसका रास्ता रोका और वो उससे टकराकर ज़मीन पर गिर पड़ा. फिर से सिक्के ज़मीन पर बिखर गयें. टक्कर इतनी तेज थी कि वो बेहोश हो गया. सिर से खून बह रहा था. होश आया तो खुद को कुर्सी पर बैठा पाया. सिर पर पट्टी बंधी थी और सामने सोफे पर जीजी बैठा था.

[कहानी अभी बाकी है]
[नहीं हँसने-मुस्कुराने वाला जोकर, जीजी की परेशानी हल कर पाएगा? या उसे भी जीजी की बंदूक का शिकार होना पड़ेंगा? या कहानी में आयेंगा नया मोड़? जानने के लिए पढ़ते रहिये 'जोकर' अगले रविवार सिर्फ Lines From Heart पर]
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