मजहब(भाग-1)



रिवोल्वर को अपनी तरफ ताने देख एकाएक ही कमली के आँसू सुख गए. वो आहिस्ता-अहिस्ता अपने घुटनों के बल खड़ी हुई. वो एकटक गिरिराज की आँखों में अपने मसीहा को ढूंढ रही थी. हर दिन गिरिराज के संग चारदीवारी के भीतर रहते हुए वो यह बात भूल गई थी कि चारदीवारी के भीतर और बाहर के गिरिराज में काफी फर्क था. बाहर वो हिंदुत्व से प्रेम करता था और अंदर उससे. आगबबुला गिरिराज रिवोल्वर ताने खड़ा था और कमली प्यार से एकटक देख रही थी.

मरने वाली की आखिरी ख्वाहिश नहीं पूछोंगे

        ...ट्रिगर दबा और कमली की कहानी खत्म. दरवाजे पर उसकी बेटी रानी कंधे पर स्कूल का बैग डाले खड़ी थी. उसके चेहरे पर अपनी माँ के खून के छींटे थे. हमेशा गोली की आवाज सुनकर खिलखिलाने वाली रानी आज पहली बार डर के साये में खड़ी थी. उसने धीरे-धीरे पलकें उठाकर गिरिराज की तरफ देखा. गिरिराज के होंठो पर गम भरी मुस्कुराहट थी. रानी बैग को फर्श पर फेंकते हुए वहां से भाग गईं. गिरिराज काफी देर लाश के पास बैठा उसे निहारता रहा फिर उसने अपने एक कार्यकर्ता को फ़ोन कर बुलाया और लाश ठिकाने लगाने का कहकर वहां से चला गया.
        
बाहर बारिश हो रही थी. रानी सड़क पर भागे जा रही थी. चेहरे पर खून छींटे बारिश में धुल रहे थे. वो तब तक भागती रही जब तक थककर ज़मीन पर गिर न पड़े. जैसे ही वो ज़मीन पर धडाम से गिरी, उसके कानों में कमरे की गूंज सुनाई दी. उसने अपने दोनों हाथो से कसकर कान दबाये और जोर-जोर से मम्मी-मम्मी चिल्लाने लगी. तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा. उसने तपाक-से पलटकर देखा. कोई नहीं था. बस एक वहम...माँ के कोमल स्पर्श का.
        गिरिराज फिर से अकेला हो गया था. उसका किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था. दिलोदिमाग में  कमली के सिवाय और कुछ नहीं था. उसने रानी को ढूंढने की ज़रा भी कोशिश न की. आखिर वो एक मुसलमान का खून थी. उसने कार्यालय से कुछ दिनों की छुट्टी ले ली. और किसी को बिना बताये शहर से बाहर कहीं चला गया.
       रानी, रज्जो-रानी के घर चली गई. पहली बार रानी को अकेला अपने घर पर आते देख वो चौंक गई. फिर कमली की मौत की खबर सुनी तो खूब रोई लेकिन गिरिराज के खिलाफ क़दम उठाने की उसमें हिम्मत न थी. वो चुप रही, उसको बस रानी की फिकर थी, कहीं गिरिराज उसे भी ना मार दे. उसने अपने एक पुरानी अजीज मित्र हामिद से मदद मांगी. उसने रानी को शहर के बाहर सही सलामत रखने का भरोसा दिलाया. रज्जो ने रानी को समझाया कि माँ की हत्या वाली बात किसी को ना बताये.
               धर्मपुर गाँव के बस-स्टैंड पर बस आकर रुकी. गाँव के मौलवी बस से उतरे. उनके साथ रानी भी थी.
       रानी को तक़रीबन एक महिना होने आ गया था. वो मौलवी के घर के भीतर ही गुमशुम रहती है. ना हँसती, न रोती, बस गुमशुम. मौलवी उसे जबरदस्ती बात कराता रहता, हँसाता रहता. लेकिन उसका बात करना, मुस्कुराना मात्र औपचारिक भर था. धीरे-धीरे वो धर्मपुर के हवा-पानी में रमने लगी. माँ की यादें पूर्ण-रूप से धुंधली तो नहीं हुई थी, लेकिन अब उसे इतनी ज्यादा याद भी नहीं आती थी.
         मौलवी ने उसे अपने साथ हर रोज मदरसा ले जाने का फैसला किया. पहले दिन मदरसे में बहुत-सारे बच्चे देखकर खुश होने के बजाय भी वो गंभीर ही रही. मौलवी ने उसे बीच में दरी पर बैठने को कहा. उस दिन लल्ला देरी से आया. अपनी जगह पर किसी और को बैठा देख तिलमिला उठा.

मेरी जगह से उठ

रानी ने उसकी तरफ देखकर कोई जवाब नहीं दिया.

उठ ना, मेरी जगह है यह

       रानी ने फिर भी कोई जवाब नहीं दिया. लल्ला को गुस्सा आ गया और उसने अचानक ही रानी को दूसरी तरफ धक्का दे दिया. रानी पास वाले लड़के पर गिर पड़ी. वो घबरा गई और जोर-जोर से रोने लगी. सारे बच्चे उसी को देखने लगे. वो और ज्यादा जोर-से रोने लगी. मौलवी भागकर आया और रानी को चुप कराया. मौलवी ने लल्ला को डांट लगाईं. अब रानी चुप थी और लल्ला धीरे-धीरे रो रहा था. मौलवी ने रानी को अपनी कुर्सी के पास बिठा दिया.
       उस दिन रानी और लल्ला एक-दूसरे को देखते ही रहे. शायद वो मासूम जान अंदर ही अंदर खुद को कोस रहे थे. लल्ला सोच रहा था मैंने अगर उसे धक्का नहीं दिया होता तो वो नहीं रोती और रानी सोच रही थी मैं ही उसकी जगह पर बैठी इसलिए उसने मुझे धक्का मारा, फिर मेरी वजह से डांट पड़ी और वो रोया.
              अगले दिन लल्ला जल्दी से जल्दी मदरसा पहुँचने की जद्दोजहद में था. मदरसा पहुंचकर देखा उसकी जगह पर कोई नहीं बैठा था बल्कि रानी उसके पास वाली जगह पर बैठी हुई थी. लल्ला अपनी जगह पर जाकर बैठ गया.

तू मेरे पास क्यूँ बैठा?”-रानी चिढ़ते हुए मुंह बनाकर बोली.
यह मेरी जगह है, तू मेरे पास क्यू बैठी है?”-लल्ला गुस्सा में बोला.
तो, मैं भी अपनी जगह ही बैठी हूँ
तेरा नाम क्या है?”-रानी की तीखा जवाब सुनकर लल्ला के पास उसका नाम पूछने के अलावा और कुछ नहीं सूझा.
रानी और तेरा?
लल्ला
लल्ला....हाहाहाहाहाहा....यह कैसा नाम है?”

         रानी ने यह नाम पहली बार सुना था. वो खुद की हँसी पर काबू न कर पाईं और हँस-हँसकर लोट-पोट हो गईं. लल्ला को बहुत बुरा लगा. वो बुरी तरह चिढ़ गया और रानी को धक्का देकर अपनी जगह से उठा और सबसे आगे वाली पंक्ति में जाकर बैठ गया. रानी काफी देर तक हँसती रही. वो लल्ला के पीछे मुड़कर देखने का इंतज़ार कर रही थी ताकि उसे चिढ़ा सके. लेकिन लल्ला ने नहीं देखा. रानी उदास हो गईं.
         खाना खाने की छुट्टी में रानी, लल्ला से बात करना चाहती थी. वो उसके पास जाती तो लल्ला उठकर कहीं और चला जाता. इसी मनाने के चक्कर में रानी का टिफिन गिर गया. रोटी-सब्जी फर्श पर फ़ैल गई. वो मायूस होकर एक कोने में जाकर बैठ गईं. कुछ देर बाद लल्ला उसके करीब आया और अपना टिफिन आगे किया. इस तरह उन दोनों की दोस्ती हो गईं.

तू रहती कहाँ है?”
“मौलवी साहब के घर और तू”
“दादी के घर”
“अच्छा और मम्मी-पापा”
“मम्मी भगवान के पास चली गईं और पापा उसे लाने गयें है”

     रानी छुप. दिल के किसी कोने में उसे अपनी माँ की याद सताने लगी थी.        

“और तेरे मम्मी-पापा?”
“मेरी मम्मी भी भगवान के पास चली गई, लेकिन...”
“लेकिन क्या?”
“कुछ नहीं”
“बोल ना, लेकिन क्या?”
“लेकिन मेरे पापा उसे लेने नहीं गयें”
“क्यूँ? तेरे पापा तेरी मम्मी से प्यार नहीं करते थे क्या?”
      रानी के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं था. वो अंदर ही अंदर रो रही थी. दिल कर रहा था सब लल्ला को बता दे लेकिन उसे रज्जो-रानी की कही हुई बात याद आ रही थी.

“तू मेरी दादी से मिलेंगी”
“कब?”
“छुट्टी के बाद”
“ठीक है

       छुट्टी के बाद लल्ला, रानी को लेकर अपने घर पहुंचा. दादी गीता का पाठ कर रही थी.

दादी, यह देखो कौन है?”
“अरे! यह कौन हैं इतनी सुंदर बिटिया?”
“मेरे साथ पढ़ती है”
“कहाँ रहती हो तुम? किसकी लड़की हो?”
“मेरी पाठशाला के मौलवी साहब हैं ना, उन्हीं के घर”
            
        दादी की आँखें खुली की खुली रह गईं. कुछ पलों के बाद वो दायें हाथ से अपनी छाती को मसलने लगी और फिर फर्श पर यथावत अवस्था में लुढ़क गईं. मौलवी साहब का नाम सुनते ही दादी को समझने में कतई देर न लगी कि लल्ला पाठशाला से पहले बने मदरसा में पाठशाला समझकर चला गया. गाँव के पुरानें हालतों के मद्देनजर लल्ला गलत हाथों में तो नहीं पड़ गया? उन्होंने उसके साथ क्या किया होगा? कहीं लल्ला को मुसलमान तो नहीं बना दिया? कुछ ही पलों में ऐसे कई सवालों से दादी को गहरा सदमा लगा और दिल का दौरा पड़ने से चल बसी.
        सभी गाँववाले इकठ्ठा हो गयें. उन्होंने बमुश्किल से जानकरी जुटाकर लल्ला के बाप को शहर इतला कर दी. सबने मिलकर निर्णय लिया, लल्ला का बाप सुबह तक आ गया तो ठीक है, वरना हम सब मिलकर अंतिम संस्कार कर देंगे.
         धुल का घना गुब्बार बनाती खुली जिप्सी ने गाँव में प्रवेश किया. चौपाल पर बैठे सब लोग खड़े होकर अचंभित निगाहों से देखने लगे. पहली बार गाँव में ऐसी जिप्सी देखकर कुछ शरारती बचे उसके पीछे दौड़ने लगे. लल्ला के घर के सामने जिप्सी रुकी. लल्ला का बाप नीचे उतरा....गिरिराज सिंह. घर के भीतर पहुँचते ही सब लोग खड़े हुए. दादी की लाश के पास लल्ला रो रहा था. उसने रोते-रोते अपने पिता की तरफ देखा. गिरिराज ने अपनी माँ को हाथ जोड़े फिर एकटक अपने बेटे को देखने लगा. 8 साल बाद वो उसे देख रहा था. इतने बड़े हो चुके लल्ला को देखकर गिरिराज का सीना गर्व से फूलें नहीं समां रहा था. गिरिराज ने उसे गोद में उठाकर चुप कराया. दादी का अन्तिम संस्कार हुआ.
        लल्ला के मन में अपने पिता के प्रति कोई प्रेम नहीं था. उसने अब तक एक बार भी पिता, पापा नहीं बोला था. यह बात गिरिराज को भी अखर रही थी लेकिन उसे पता था इसका जिम्मेदार वो खुद है और धीरे-धीरे सब सामान्य हो जायेंगा. लल्ला बस गुमशुम रहता. उस मासूम जान को समझ में नहीं आ रहा था कि वो किस तरह व्यवहार करे? जिस पिता को उसने जन्म से नहीं देखा हो उसके प्रति ऐसा होना स्वाभाविक था. गिरिराज को अगर उसके प्रति दुलार था तो सिर्फ स्वार्थ के खातिर, अपना उत्तराधिकारी.
        ...लेकिन आखिर कब तक, लल्ला को लेकर गाँव के मुसलमानों में खुसर-फुसर शुरू हो गई थी. मौलवी को जिस दिन का इंतज़ार था वो आ गया था. एक मुस्लिम युवक बस-स्टैंड पर नाई की दूकान में बैठा अख़बार पढ़ रहा था. दूकान में दो हिन्दू और थे, एक दाढ़ी बनवा रहा था तो दूसरा मुस्लिम युवक के के पास बैठा था.

दादी तो चल बसी, क्या वो लल्ला को अपने साथ लेकर जायेंगा?”-नाई दाढ़ी बनाते हुए बोला.
क्या पता?, वैसे यहाँ भी तो किसके भरोसे छोड़ेंगा?”-एक हिन्दू युवक बोला.
सुना है यूपी में बड़ा रौब चलता है इसका”-दूसरा हिन्दू युवक बोला.
ठीक ही सुना है, अपनी हिन्दुओं की कोई सेना है, उसका अध्यक्ष है”-नाई बोला.
तब तो पक्का लेकर जायेंगा, कौन बाप अपने बेटे को अपनी तरह हिंदूवादी नहीं बनाना चाहेगा?”
क्या ख़ाक बनाएंगा?, उसका बेटा तो मुसलमान है, मुसलमान”-मुस्लिम युवक अख़बार एक तरफ फेंक खड़े होते हुए जोश में बोला.
“क्या बक रहे हो?
बक नहीं रहा हूँ, सच बोल रहा हूँ
“देख भाई, गाँव बड़ी मुश्किल से शांत हुआ है, अब दुबारा से उसे दंगो की आड़ में मत धकेल”
“अगर विश्वास नहीं होता तो खुद चलकर देख लो मदरसे में”

        दोनों युवक उस मुस्लिम के साथ मदरसे पहुंचे. लल्ला, रानी के पास बैठा पढ़ रहा था. एक से दुसरे, दुसरे से तीसरे, ऐसा करते करते यह बात पूरे गाँव में फ़ैल गई. गिरिराज के कानों में पहुंची तो उसके पांवो तले ज़मीन खिंच गईं. उसे गाँव के सरपंच ने बताया. गिरिराज ने आव देखा न ताव, जिप्सी को मदरसे की तरफ दौड़ाई.
        मुसलमानों को देखना पसंद नहीं करने वाला गिरिराज आज मदरसे के दरवाजे पर खड़ा था. अंदर लल्ला मौलवी के पास खड़ा बच्चों को उर्दू में पाठ पढ़कर सुना रहा था. गिरिराज की आँखें धुंधलाने लगी. उसका सिर चकराने लगा. वो बड़ी मुश्किल से जिप्सी चलाकर घर पहुंचा. उसे ऐसा लग रहा था मानो उसके हाथ-पाँव काम नहीं कर रहे हो. ज़िन्दगी का सबसे बड़ा धक्का लगा था.
        अँधेरे कमरे में आराम कुर्सी पर बैठा वो रो रहा था. आँखों में आँसू नहीं थे लेकिन अंतर्मन फूट-फुटकर रो रहा था. जिस अंतर्मन को बचाने के लिए उसने कमली की जान ली थी अब वो ही अंतर्मन कहीं और जुड़ रहा था. अंतर्मन के रोने की आवाज उल्टी दिशा में बीती हुई पीढ़ियों तक सुनाई दे रही थी. पीढ़ियों से चले आ रहे कट्टरवाद को हर एक पीढ़ी एक कदम आगे ले गई यही, लेकिन लल्ला, उसने 6 महीनों में सब तबाह कर दिया. गिरिराज को पछतावा हो रहा था कि वो लल्ला को अपने साथ क्यूँ नहीं ले गया?
        लल्ला घर पहुंचा. घर में अँधेरा देखकर वो अपने पिता को पुकारना चाहता था लेकिन जिस शब्द को उसने 8 साल से नहीं बोला हो उसे बोलने में संकोच हो रहा था. वो छोटे-छोटे कदमों से डरते हुए कमरे में अपने पिता के सामने पहुंचा. गिरिराज आँखें बंद किये बैठा था. लल्ला संकोच में काफी देर अपने पिता को देखता रहा फिर धीरे-से बोला “पापा”. गिरिराज की आँख खुली. पहली बार लल्ला के मुंह से पापा शब्द सुन वो भावुक हो गया. घुटनों के बल बैठकर उसे सीने से लगा लिया. आँखें भीग गई.          
        लेकिन अपने से अलग करते ही उसने अपने बेटे के माथे पर रिवोल्वर तान दी. लल्ला डर गया और रोने लगा. गिरिराज ट्रिगर दबाना चाहता था लेकिन दबा नहीं पा रहा था. उसके हाथ काँप रहे रहे थे. लल्ला की आँखों में उसे वो सपने दिख रहे थे जो उसके पूर्वज अपने बेटे की आँखों में देखा करते थे. अपने हाथो से वो उन सपनों को दफ़न नहीं कर सकता था. आखिर इसका जिम्मेदार वो स्वयं था. उसने लल्ला के माथे से रिवोल्वर हटा अपनी कनपटी पर लगा दी. अब उसे लल्ला की आँखों में सपनों की बजाय दुस्वप्न नजर आने लगे थे. लल्ला नमाज अदा कर रहा है. लल्ला मुसलमान की टोपी पहने ईद मुबारक कर रहा है. गिरिराज को भीतर ही भीतर डर सताने लगा कि अगर मैं मर गया तो लल्ला को मुसलमान बनने से कोई नहीं रोक पाएंगा. जो मेरे नाम, स्वाभिमान, इज्ज़त, पुरखों पर कलंक होगा जिसे कोई नहीं धो सकता. वो धर्मसंकट में फंस चूका था, ना लल्ला को मार सकता था ना खुद को. उसने गुस्से में रिवोल्वर फेंक दी. अपने बाल नोचकर घायल शेर की भांति दहाड़ने लगा. अपने पिता के इस तरह व्यवहार से लल्ला और जोर-से रोने लगा. तभी....
          ....एक जोर-से आवाज हुई. गिरिराज फर्श पर गिर पड़ा. लल्ला के चेहरे पर उसके पिता के खून के छींटे थे. उसका रोना बंद हो गया. वो सहमा-सा खड़ा अपने पिता को देख रहा था. दरवाजे पर 6 साल की बच्ची रिवोल्वर ताने खड़ी थी जिसकी शक्ल अँधेरे में साफ़ नहीं दिख रही थी. वो रानी थी. थोड़ी देर पहले ही वो लल्ला के घर पर आई थी. उसे अपनी माँ के हत्यारे को पहचाने में ज़रा-सी भी गलती नहीं हुई. घबराते हुए दरवाजे के पीछे छुप गई. गिरिराज ने जब रिवोल्वर फेंकी तो वो सीधी दरवाजें के पार रानी के पास आकर गिरी. यह वो ही रिवोल्वर थी जिसे लखनऊ में गिरिराज ने उसको चलाना सिखाया था, लेकिन उसे यह नहीं पता था कि वो एक दिन उसी पर चल जायेंगी. रानी ने अपनी माँ की मौत का बदला गिरिराज से लिया. जिस तरह रानी का चेहरा उसकी माँ के खून के छींटो से सना गया था वैसे ही लल्ला का चेहरा उसके पिता के खून के छींटो से सना गया. रिवोल्वर फेंककर रानी वहां से भाग गई.
          अगले दिन गाँव के हालात फिर से पहले जैसे होने के आसार दिखने लगे. गाँव में हिन्द सेना के काफिलों का जमावड़ा हो गया था. कार्यकर्ता एक-एक मुसलमान को घर से बाहर निकाल-निकालकर बेरहमी से पूछताछ कर रहे थे. लेकिन कोई यह नहीं जानता था कि गिरिराज की हत्या किसने की? यहाँ तक की लल्ला भी नहीं, क्यूंकि गोली चलने की आवाज सुनते ही वो स्तब्ध हो गया था, उसने दरवाजे की तरफ देखा ही नहीं. रानी मौलवी के घर में दुबकी हुई थी. वो बेहद घबराई हुई थी. लेकिन उसे इस बात का अंदाजा नहीं था कि वो अब लल्ला से कभी नहीं मिल पाएंगी. गिरिराज के अंतिम-संस्कार के बाद लल्ला को लखनऊ ले जाया गया. वो वहां हिन्द-सेना के कार्यालय में रहता था. उसका स्कूल में दाखिला करवाया गया. वहीँ दूसरी तरफ धर्मपुर में रानी मदरसा में पढ़ रही थी. लेकिन लल्ला के बिना अब उसका मन नहीं लगता था. वो उसे याद करके खूब रोती. कुछ ऐसा ही हाल लखनऊ में लल्ला का था. वक्त बीत रहा था.
           लल्ला-रानी का आखिर कसूर क्या था?, पहले उन्होंने अपने ऊपर से माँ-बाप का साया गंवाया फिर एक-दूसरे का साथ. जब कोई बच्चा जन्म लेता हैं तो उसे नहीं पता होता कि वो किस मजहब की कोख से पैदा हुआ है? जैसे-जैसे बड़ा होता है उसे मजहबी पाठ पढ़ाया जाता है जिसका खामियाजा बच्चे, बुद्धे, औरते, कसूरवार, बेगुनाह सबको भुगतना पड़ता है. हो सकता हैं मजहब की परिभाषा से अनजान लल्ला-रानी जिस वातावरण में पल-बढ़ रहे है उसका शिकार होकर निकट भविष्य में एक-दूसरें के खिलाफ ही बंदूके तान दे, जिसका खामियाजा और किसी लल्ला, रानी गिरिराज, कमली, दादी को भुगतना पड़े.

समाप्त!


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