...Also like my upcoming short film page the LEGEND of KABIRA

मजहब, एक ऐसा शब्द था जिसने ‘धर्मपुर’ गाँव को कभी चैन से न सोने दिया न जगने दिया, न जीने दिया न मरने. इस गाँव का हर एक बंदा अपने समुदाय का बाहुबली बनना चाहता था, जिसके परिणामस्वरूप गाँव हर रोज जलता रहा. एक दिन बाहुबली थक गए और जलना थम गया, फिर भी लोग घरो में दुबके रहे. पता नहीं कब, कौन, कैसे, कहाँ मार दिया जाए?
      पिछले दो सालों से हालत कुछ सामान्य हुए थे, बच्चे पाठशाला जा रहे थे, खुले में खेल रहे थे, बस औरतो और बच्चियों पर पाबंदी थी. लेकिन लल्ला 8 साल का होने के बावजूद भी पाठशाला नहीं जा गया था. वो अपनी बुड्ढी दादी के साथ रहता था. उसके जन्म के समय ही माँ चल बसी, फिर उसके पिता उसे और दादी को छोड़कर शहर चले गयें. पिछले 8 साल से हर महीने रूपये भिजवा दिया करते है पर एक बार भी गाँव नहीं लौटे. इस तरह लल्ला अपने पिता को नहीं पहचानता था.
     
हालत सामान्य होने के बावजूद दादी डरती थी, उसने लल्ला को कभी घर से बाहर अकेले नहीं जाने दिया. वो मंदिर-बाजार जाती तो लल्ला को घर में बंद करके जाती है. वो नहीं चाहती थी किसी गैर-जात की नजर इस पर पड़े. लल्ला के दादा को मुस्लिम युवक ने गाँव के चौपाल पर दिन-दहाड़े गोली मार दी थी. इस वजह से भी दादी के मन में डर था, कहीं बिना माँ-बाप का मासूम लल्ला अपने दादा की तरह साम्प्रदायिकता की बलि न चढ़ जाए?

दादी, कब तक लल्ला को ऐसे ही अपनी छाती से चिपकाए रखोगी?, पाठशाला वगैरह भेजो, ताकि बड़ा होकर अपने पैरों पर खड़ा हो सके, तुम तो आज हो कल नहीं, इसके कल की तो फिकर करो, हमारे बच्चे भी तो जाते है, भगवान का शुकर है उनको तो कुछ नहीं हुआ

      पडौस की चंद्रा चाची जब लल्ला को घर के चारदीवारी के भीतर देखती तो उसका दिल पसीज जाता. वो हर रोज दादी को समझाती कि उलटे-सीधे ख्वाब बुनने के बजाय सबकुछ ईश्वर के भरोसे छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए. दादी की हिम्मत तो उसी दिन जवाब दे गई थी जिस दिन दादा हैंडपंप से पानी भरने उसके साथ आये थे और चौपाल पे निगरानी रख रहे थे कि कौन हरामखोर हम हिन्दुओं की बहु-बेटियों पर नजर डालता है? दादी सिर पर पानी का घड़ा रखकर मुड़ी ही थी कि जोर से आवाज हुई और दादा लहूलुहान ज़मीन पर गिर पड़े. अजीब संयोग ही था कि दादा के ज़मीन पर गिरते ही दादी के सिर पर रखा घड़ा न जाने कैसे फूट गया? और दादी दुःख के सरोबार में डूब गईं. उस दिन से घड़े का पानी जेहन में ऐसा समा गया कि वो हर रोज आँखों से बहता रहा. 18 साल बीत गए पर अभी तक जेहन में समाया घड़ा खाली नहीं हुआ.

दादी”
“हूँ”
“वो पडौस का चन्दन रोज सुबह थैली लेकर कहाँ जाता है?

दादी खामोश हो गईं. पलटकर एकटक लल्ला की आँखों में देखने लगी फिर धीरे से बोली “पाठशाला”.

यहाँ क्या होता है?”
“तू खुद कल देख लेना”

        आख़िरकार चंद्रा चाची की जीत हुई. दादी ने मन बना लिया था लल्ला को पाठशाला भेजने का. अगली सुबह दादी जल्दी उठकर पाठशाला गईं और दाखिला करवाया. उस दिन लल्ला को हल्का बुखार था तो दादी ने उसे नहीं उठाया, सोचा दाखिला करवा आती हूँ, फिर एक-दो दिन में तबियत ठीक होगी तब पाठशाला भेज दूंगी. अगली सुबह लल्ला एकदम स्वस्थ हो गया. दादी ने नहला कर नए कपडे पहनाये. एक थैली में पुरानी डायरी और पेंसिल डालकर उसके कंधे पर डाल दी. लल्ला एकदम बहादुर सिपाही की तरह की तन कर खड़ा था और दादी बस अपनी आँखें पौंछ-पौंछकर लल्ला के सामने सैलाब को फूटने से रोक रही थी.

        गली के नुक्कड़ पर खड़े होकर दादी ने हाथ से इशारा करके लल्ला को बताया ‘’वो रही तेरी पाठशाला, उसके अंदर जाकर बैठ जा’’. लल्ला ने हाँ में गर्दन हिलाई और दादी घर की तरफ जाने को मुड गई. लल्ला पाठशाला की ओर बढ़ा. कुछ कदम ही चला था कि उसके कदम रुक गए. वो भ्रमित-सा देखने लगा. पाठशाला से पहले मदरसा बना हुआ था. लल्ला के सामने अब दो बड़े दरवाजे थे. दोनों ही दरवाजों से बच्चे आ-जा रहे थे. लल्ला दोनों दरवाजों को बारी-बारी से देखकर सोचता रहा कि किसके अंदर प्रवेश करूं? कुछ देर सोचने के बाद वो एक सही निर्णय पर पहुंचा उअर आगे बढ़कर मदरसे में घुस गया.

आप सभी को बताते हुए मुझे बेहद हर्ष हो रहा हैं कि आप सभी का चहेता, कर्तव्यनिष्ठ, स्वाभिमानी, हिंदूवादी नेता ‘गिरिराज सिंह’ को आज हिन्द सेना की कमान सौंपी जा रही है...मुझे उम्मीद हैं कि उनके हिन्द सेना के अध्यक्ष पद पर आसीन रहते लाखो कार्यकर्ताओं के विश्वास पर खरे उतरते हुए लखनऊ ही नहीं, उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देशभर में हिंदुत्व की लहर को कोने-कोने तक पहुंचाएंगे

      तालियों की गडगडाहट व नारेबाजी के बीच गिरिराज सिंह अपनी कुर्सी से उठा. 38 वर्षीय अधेड़, लम्बा-चौड़ा कद, चेहरे पर तेज, माथे पर कुमकुम का टीका, लम्बी मूंछे व एक कट्टर मुस्कान. सेना के वरिष्ठ नेताओं ने उसे माला व केसरिया साफा पहनाते हुए अभिवादन किया. गिरिराज ने हाथ हिलाकर हजारों की संख्या में मौजूद कार्यकर्ताओं का अभिवादन किया.
              गिरिराज कौन था? कहाँ से आया था? इस बात से पूरा लखनऊ अनजान था. उन्हें तो बस इतना पता था कि उसके लखनऊ आने के बाद मुसलमानों को मारने-काटने की घटनाएं दिन-ब-दिन बढ़ रही थी. बिना सबूत के पुलिस भी कुछ नहीं कर पा रही थी. वो इतना खूंखार कट्टरवादी था कि उसे मुसलमान देखे न सुहाते थे. मुसलमान उसके नाम से थर-थर कांपते थे. यही वजह थी कि देश में हिंदुत्व की लहर फैलाने का सेहरा उसके सिर बाँधा गया था. 
       वो गरम मिजाज का होने के बावजूद पूरे लखनऊ में सिर्फ एक के प्रति ही नरम था. लखनऊ की मशहूर तवायफ ‘कमली’ या यूँ कहे कि तवायफों की रानी. गिरिराज उसके इश्क में गिरफ्त था. यह आज से तक़रीबन 2 साल पहले शुरू हुआ था जब गिरिराज एक कार्यकर्त्ता के रूप में नया चेहरा बनकर उभरे थे और फिर उन्हें हिन्द सेना का सचिव बनाया गया.
        एक दिन वो अपने कार्यालय में बैठा था कि उससे मिलने ‘रज्जो रानी’ आई. रज्जो-रानी वो औरत थी जो लखनऊ के न जाने कितने वैश्यालयो की अकेली मालकिन थी. वो गिरिराज के पास मदद की गुहार लेकर पहुंची थी. कमली उन दिनों धंधे में नयी थी. उसकी 4 साल की एक बेटी भी थी. जिसका नाम उसने ‘रानी’ रखा था. कमली के हुस्न ने शहर में उसको नयी शौहरत दी. फिर कुछ 2-3 मुस्लिम लड़के आकर बंदूक की नौक पर बिना पैसे दिए जबरदस्ती करने लगे. धमकी देने लगे कि चुपचाप जैसा बोलते है वैसा कर नहीं तो तेरी बेटी को मार देंगे. वो हर पल सहमी रहने लगी. उसने रानी को स्कूल भेजना बंद कर दिया. बेटी के खातिर पुलिस में भी शिकायत नहीं की और फिर इस तरह एक दिन गिरिराज उसके लिए मसीहा बन गया.
        गिरिराज ने रानी की सुरक्षा के लिए एक कार्यकर्ता को उसे स्कूल लाने-ले जाने का जिम्मा सौंप दिया. वो खुद हफ्ते में एक-दो बार उनकी खैरियत पूछने आता रहता था. कमली जिस मर्द जात से नफरत करती थी उसमें गिरिराज अपवाद बनकर सामने आया. एक तवायफ के प्रति उसकी दरियादिली ने कमली के दिल में खास जगह बना दी. सच तो यह था कि गिरिराज जो कुछ भी कर रहा था वो हिंदुत्व के खातिर कर रहा था. हफ्ते में एक-दो दिन का आना-जाना धीरे-धीरे बढ़ने लगा. जो गिरिराज पिछले कुछ सालों से अकेला पल गुजार रहा था, उसे कमली व रानी के संग पल बिताना अच्छा लग रहा था और वहीँ से दोनों के बीच मोहब्बत की शुरुआत हुईं.
        पिछले एक साल से कमली ने अपने जिस्म का सौदा छोड़कर दुसरो के जिस्म के सौदे का काम करने लगी थी. रज्जो-रानी ने अपने बढ़ते व्यापर को देखते हुए उसे दो वैश्यालय का जिम्मेदारी सौंप दी. गिरिराज को उससे कोई आपत्ति नहीं थी. वो तो वैसे भी कमली संग अपने सम्बन्ध को राज ही रखना चाहता था.
          गिरिराज हर वक्त अपने पास रिवोल्वर रखता था. जब भी वो कमली के साथ बिस्तर पर व्यस्त होता, तब रिवोल्वर टेबल पर रखी होती थी. रानी उसे उठाकर निहारती. उससे खेलती रहती. उसे एक अलग ही आनंद अनुभव होने लगा. हर रोज उस रिवोल्वर से खेलना रानी की आदत में शुमार हो गया. गिरिराज के आते ही वो उससे रिवोल्वर की जिद करती और गिरिराज मना नहीं कर पाता.
          एक दिन गिरिराज रिवोल्वर को लॉक करना भूल गया. रानी ने खलेते-खेलते ट्रिगर दबा दिया. गोली जाकर सीधा बल्ब पर लगी और कमरे में अँधेरा हो गया. कमली चिल्लाई. रानी को कुछ हो तो नहीं गया, यह सोच-सोचकर उसकी साँसे थमने लगी. गिरिराज ने फटाफट बिस्तर से उठकर कमरे में माचिस ढूंढी. बमुश्किल से माचिस मिलते ही जलाई. उसकी रोशनी में रानी का मुस्कुराता हुआ चेहरा चमक रहा था. गिरिराज रानी के निडर अंदाज़ से काफी प्रभावित हुआ. कमली उसे अपनी छाती से लगाकर काफी देर रोती रही. वो गिरिराज पर भड़की,  आगे से यह रिवोल्वर अपने साथ लाकर नहीं आओगे. लेकिन गिरिराज के दिमाग में कुछ ओर ही चल रहा था. जिस गोली की आवाज से लोगों की फटती थी, उस आवाज पर 6 साल की मासूम बच्ची मुस्कुरा रही थी. वो उसकी निडरता को बेवजह जाया नहीं करना चाहता था. वो काफी दूर की सोच रहा था. शायद आगामी वर्षोँ में उसका उत्तराधिकारी. अब वो हर रोज उसे रिवोल्वर चलाना सिखाने लगा. कमली की लाख कोशिशे भी उसे ऐसा करने से नहीं रोक पाई. गोली की हर एक आवाज पर रानी का खिलखिलाता चेहरा उसके अंदर हिंदुत्व के प्रति नया आत्मविश्वास जगा रहा था.
          एक-दूसरें की पुरानी ज़िन्दगी से अनजान गिरिराज और कमली ने गुपचुप तरीके से शादी करने का फैसला किया. शादी की बात आते ही कमली के दिल में एक टीस पैदा हुईं. वो परेशान रहने लगी. गिरिराज को किस तरह अपनी पिछली ज़िन्दगी के बारे में बताये? वो सोचने लगी कि अभी बताना ही ठीक रहेगा, वरना कभी न कभी तो पता चलेगा ही, तब अगर उनके रिश्ते पर आंच आई तो? जिस गिरिराज ने अपने बारे में कभी किसी को नहीं बताया था, वो कमली के बारे में जानने को भी इच्छुक नहीं रहा, पर शादी शब्द ने उसे ऐसा करने पर मजबूर किया. अपने कार्यालय मैं बैठे गिरिराज ने फैसला किया कि वो अभी कमली को जाकर अपनी सच्चाई बताएगा. उधर कमली भी गिरिराज के आने का ही इंतज़ार कर रही थी.
         धर्मपुर के सबसे पुराने घर में जहां दादी श्रीमद्भागवत गीता पढ़ते हुए मन ही मन लल्ला की सलामती के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी, वहीँ दूसरी ओर लल्ला मदरसा में कुरान-ए-शरीफ पढ़ रहा था. दादी जिस अल्लाह से डरकर भगवान से मदद की गुहार कर रही थी वो अल्लाह तो आजकल उसी के घर में रहने लगा था. 5-6 महीने बीतने को आये थे और लल्ला का राज अभी भी राज ही बना हुआ था. दादी ने लल्ला को कभी घर से बाहर जाने ही नहीं दिया इसलिए मोहल्ले के लोगों को छोड़कर गाँव के बाकी लोगों को पता ही नहीं था यह बच्चा हिन्दू है या मुसलमान. वैसे भी पाठशाला-मदरसा ऐसी जगह बने थे जहां आस-पास 100 मीटर दायरे के भीतर सारे घर वर्षो पुरानी साम्प्रदायिकता के शिकार बने हुए थे, अब वहां कोई नहीं रहता था. अगर लल्ला को रास्ते में आते-जाते कोई पहचान भी ले, तो भी किसी को क्या पता चलता कि लल्ला विद्या के किस दरवाजें के भीतर इबादत कर रहा था?
         मौलवी ने तो पहले दिन ही लल्ला को पहचान लिया था. जिस गाँव में मजहबी-प्रेम न हो वहां एक कौम दूसरी कौम को नीचा दिखाने का कोई मौका कैसे गँवा सकती हैं? मौलवी ने यह बात अपने कौम के लोगों को बताई और साथ ही यह हिदायत दी कि यह बात किसी से साझा न करे, आने वाले वर्षोँ में यह बच्चा हिन्दुओं के खिलाफ इस्तेमाल करने का सबसे बड़ा हथियार होंगा.
          दरवाजे के खटखटाने की आवाज से कमली की नींद टूटी. गिरिराज के बारे में सोचते-सोचते पता नहीं कब आँख लग गईं. रानी स्कूल गयी हुई थी. उसने पलंग से उठकर दरवाजा खोला. गिरिराज था. वो कुछ देर दरवाजे पर खड़ी उसकी आँखों में देखती रही.

अंदर आने भी दोगी या ताउम्र यहीं खड़ा रहूँ”-इतना सुनते ही कमली, गिरिराज से लिपट गई.

           गिरिराज, कमली की गोद में सिर रखे लेटा था. दोनों अधनग्न अवस्था में थे. कमली उसके बालों को सहला रही थी. चारों तरफ खामोशी ही ख़ामोशी सिवाय दोनों के अंतर्मन में.

मुझे अब चलना चाहिए”-इतना कहकर वो पलंग से उठकर कपडें पहनने लगा. कमली बस उसे देख रही थी. दिल में छुपे एक राज को बताने के लिए वो जिसके आने का इंतज़ार कर रही थी वो वापस लौटने वाला था लेकिन कमली अपने दिल से वो राज नहीं निकाल पाईं. गिरिराज का भी ऐसा ही हाल था.

मैं दरवाजा खोल रहा हूँ, तुम कपड़े पहन लो”-कमली ने बदन पर साड़ी लपेटी. गिरिराज ने दरवाजा खोला.
सुनो
हाँ”-गिरिराज मुड़ा.
तुमसे कुछ पूछना था
पूछो”-कमली पलंग से उतरकर उसके करीब आयी.
“यहीं कि तुमने कभी रानी के बारे में नहीं पूछा”-यह सुनकर गिरिराज मुस्कुराया.
“उसमें पूछना क्या है?, जो तुम काम करती थी, उसमें हर रोज न जाने कितनो से मिलना होता रहता था, रानी के बाप के बारे में पूछकर मैं तुम्हे लज्जित नहीं करना चाहता था
इसी इज्ज़त के खातिर ही तो मैं तुम्हे अपना दिल दे बैठी, पर यह सच नहीं है
“अगर यह सच नहीं है, तो सच क्या है?
सच तो यह हैं कि, मैं जिस लड़के से प्यार करती थी उसने मुझे धोखा दिया, मुझे गर्भवती कर पुरे गाँव के सामने बदचलन बताकर बदनाम किया, उसके बाद पंचायत ने मुझे गाँव से निकालने का फरमान सुना दिया, मैं प्रसव-पीड़ा में दर-दर भटकती रही और एक दिन रेलवे स्टेशन पर रानी को जन्म दिया, उसी दिन मेरी मुलाकात रज्जो-रानी से हुई, वो मुझे लखनऊ लेकर आयी, मैंने 4 साल तक रानी की परवरिश की फिर इस धंधे में आ गई”

गिरिराज बिना पलकें झपकाये सुन रहा था.

...दरअसल गाँव में बेटियों को घर से बाहर जाने की अनुमति नहीं थी...इस वजह से गाँव को लोगों को ठीक से जानती भी नहीं थी...बाद में मुझे पता चला...”

गिरिराज के चेहरे के हाव-भाव बदलने लगे थे.

“...उसके झूठे प्यार का असली मकसद...मजहबी था...वो मुसलमान था”

          अगले ही पल कमली पलंग से जा टकराई. सिर से खून निकलने लगा. गिरिराज गुस्से में खड़ा तेज साँसे ले रहा था.

लव-जेहाद, हिन्दुओं के लड़के मर गए थे क्या?, जो परायी कौम की बांहों में चली थी”-गिरिराज दहाड़ा.
प्यार कभी मजहबी नहीं होता, वो तो बस हो जाता है”-कमली सिसकियाँ लेते-लेते बोली.
प्यार मजहबी नहीं होता, लेकिन मजहब से तो किया जाता हैं ना”-गिरिराज उसके बाल नोचते हुए चिल्लाया.
मैं यहाँ दिन-रात एक रहा हूँ हिंदुत्व को बढ़ाने के लिए और तुम रंडियों को परायी कौम से प्यार-इश्क-मोहब्बत की पड़ी है
मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई थी, मुझे माफ़ कर दो, इस तरह तुम नाराज मत हो”-गिरिराज के पैर पकड़कर गिडगिडाने लगी.

गिरिराज ने लात मारकर अपने से दूर किया. वो दरवाजे की तरफ जा गिरी. कुछ देर तक वैसे ही फर्श पर पड़ी रोती रही. फिर दरवाज़ा पकड़ते हुए मुश्किल से उठी.

“क्या तुम मुझे छोड़कर जा रहे हो?”

“छोड़कर मैं नहीं, तुम जा रही हो, जिस औरत का अंतर्मन एक मुसलमान से जुड़ा हो, उस अंतर्मन से गिरिराज सिंह कभी भी जुड़ा नहीं रह सकता
“मुझे इस अंतर्मन से रिश्ते को आज अभी खत्म करना पड़ेंगा, वरना वो दिन दूर नहीं जब गिरिराज का हिन्दुत्त्व दांव पर लग जाये”-इतना कहते ही उसने रिवोल्वर निकालकर कमली के सामने तान दी.

कहानी अभी बाकी है...


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Image Courtesy: GOOGLE