विद्यानगर अनाथाश्रम....
12 साल का ‘कुकुर’ छोटे-से चबूतरे पर पेड़ की छाया में बैठा, आसमान में धूप की चमचमाती रोशनी में न जाने क्या ढूंढ रहा था? किसी नेकदिल इंसान को वो सड़क पर पड़ा मिला था, उस वक्त कुकुर महज 12 दिन का ही था, तब से वो इस अनाथाश्रम के परिवार का हिस्सा है. शुरू-शुरू में सब उसे छोटू कहकर बुलाते थे, लेकिन वो एक पिल्ले के साथ खेलने में इतना मशगुल रहता कि खाना-पीना, नहाना सब भूल जाता था और इस तरह उसका नाम ‘कुकुर’ पड़ गया.
“तुम भी अनाथ हो?”
कुकुर ने पलटकर उसकी तरफ देखा और मुस्कुराया. वो बिल्लू था. कल ही वो अनाथाश्रम में भर्ती हुआ था. उसने अपने पापा को कभी नहीं देखा और माँ कुछ दिनों पहले स्तन कैंसर की भेंट चढ़ गईं.
“नहीं तो”
“यहाँ तो सारे बच्चे अनाथ है, फिर तुम क्यूँ नहीं?”
“क्यूंकि मेरे पास माँ, बाप दोनों है”
“तो तुम यहाँ क्या कर रहे हो?, उनके पास क्यूँ नहीं चले जाते?”
“वो मुझसे बहुत दूर है, इसलिए उनके पास जाना मेरे वश की बात नहीं”
“तो तुम उनसे कभी नहीं मिलते”
“मिलता हूँ ना”
“कब? कैसे?”
“रात को”
“रात को...वो कैसे?”
“आज रात को छत पर आ जाना”




एक-दूसरे का नाम जाने बिना बात को विराम देते हुए कुकुर वहां से चला गया. बिल्लू बस उसे देखता रहा. अब तक कुकुर ने उससे जो कुछ भी कहा वो सब उसके सिर के ऊपर से निकला था.
रात हो चुकी थी. बिल्लू छत पर पहुंचकर कुकुर के आने का इंतज़ार कर रहा था. चारो तरफ गहरा सन्नाटा था. आसमान तारों से भरा हुआ था. बिल्लू डरते-सहमे इधर-उधर ताक-झाँक कर रहा था कि आखिर कुकुर के मम्मी-पापा आयेंगे किधर से.
कुछ देर बाद कुकुर आ गया. वो खाली हाथ नहीं था, उसके हाथ में बिस्तर व तकिया था. बिल्लू उसके दायें-बायें देखने लगा, पर उसके साथ कोई नहीं आया था.
“तेरे मम्मी-पापा कहाँ है?”
“अभी दिखाता हूँ, रुक”
इतना कहकर कुकुर ने बिस्तर बिछाया.
“तू यहाँ अकेला सोता है”
“नहीं तो, माँ-बापू हैं ना”
“कहाँ हैं?”
बिल्लू को अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि कुकुर कहना क्या चाहता है?
“उधर चल, उस पाल पर बैठते हैं, फिर दिखाता हूँ”
कुकुर, छत की पाल पर जाकर बैठा. बिल्लू डरते-डरते चढ़ा और पैर छत की ओर लटकाये बैठ गया.
“अब बता, कहाँ है तेरे मम्मी-पापा?”
“वो रहे मेरे माँ-बापू”
कुकुर ने आसमान में तारों की ओर उंगुली से इशारा किया. बिल्लू तारोँ को भौचक्का ही देखता रह गया.
“यह तो तारें है”
“हाँ तो, वहीँ तो है मेरे माँ-बापू”
“पागल है क्या?...तारें कभी मम्मी-पापा होते है क्या?”
“होते है, तुने आसमान के देवता वाली कहानी नहीं सुनी”
नहीं तो”
“सच में”
“हाँ”
“तो सुन...तेरे और मेरे जैसा एक लड़का था...वो अपने माँ-बापू के साथ रहता था...पर एक दिन बहुत जोर से भूकंप आया...इतना जोर से की उसका घर गिर गया...उसके माँ-बापू मर गए...पर उस लड़के को कुछ नहीं हुआ...वो अपने माँ-बापू से लिपटकर खूब रोता रहा...बहुत-से लोगो ने उस लड़के को माँ-बापू से दूर करने की कोशिश की ताकि उन्हें जला सके...लेकिन वो लड़का टस से मस नहीं हुआ...बस उनसे लिपटकर रोता रहा...सब लोग थककर अपने-अपने घर चले गए...वो लड़का वहीँ रोता रहा...फिर रात को अचानक किसी ने उस लड़के को आवाज दी...”
“कौन था वो?”
“आसमान का देवता”
“सच्ची, फिर क्या हुआ?”
“आसमान के देवता ने अपनी शक्तियों से उस लड़के को माँ-बापू से अलग कर दिया...फिर भी वो लड़का रोता रहा...आसमान के देवता को बहुत दुःख हुआ...फिर उन्होंने उस बच्चे को वरदान दिया कि तेरे माँ-बापू को जलाने के बाद तू उन्हें हर रोज देख सकेगा...मैं उनको तारें बना दूंगा...फिर बच्चा चुप हो गया...और उसके माँ-बापू को जलाया गया”
“मतलब मरने के बाद मम्मी-पापा तारें बन जाते है”
“हां, मम्मी-पापा ही नहीं अपने बाकी सब घरवाले भी”
“तुझे किसने सुनाई यह कहानी?”
“कमला दीदी ने”
“यह कौन हैं?”
“अपने यहाँ काम वाली है...एक दिन मैं बहुत रो रहा था कि मुझे अपने माँ-बापू के पास जाना है तब उसने मुझे सुनाई थी”
“फिर तुझे कैसे पता चला कि तेरे मम्मी-पापा यह दोनों तारे ही है...इधर वाले भी तो हो सकते है...उधर वाले भी हो सकते है”
ऐसे थोड़े ही पता चलता है...पता करने का भी एक तरीका है”
बता”
पहले अपनी आँखें बंद कर”
“मेरी मम्मी-पापा के बारे में पता चल जाएगा”
“हाँ”
इतना सुनते ही बिल्लू का डर गायब हो गया. वो भी कुकुर की तरह पाल के दूसरी तरफ पैर करके बैठ गया.
“सबसे पहले अपनी आँखें बंद कर”
बिल्लू ने अपनी आँखें बंद कर दी.
“सबसे पहले किसका पता करना चाहेगा?”
बिल्लू ने आँखें खोल दी. वो उदास हो गया.
“क्या हुआ?”
“मैंने अपने पापा को कभी नहीं देखा”
“ठीक है...सबसे पहले पापा”
बिल्लू ने दुबारा आँखें बंद की.
“अब बोल की...हे, आसमान के देवता! मेरे पापा किधर है?”
“हे, आसमान के देवता मेरे पापा किधर है?”
“अब अपने हाथ की उंगुली को आकाश में तारों की तरफ कर”
बिल्लू ने वैसा ही किया.
“अब अपनी आँखें खोल दे”
बिल्लू ने आँखें खोली और उमीदों से भरी निगाहें आकाश की और फेरी.
“उंगुली की सीध में जो तारा हैं ना, वो तेरे पापा है”
बिल्लू आंख्ने फाड़कर उस तारे को बस घूरने लगा. वो उसमें पूरी तरह से खो चूका था.
“तेरे पापा तो मेरे पापा की बगल में ही है”


कुछ देर बाद अचानक बिल्लू, कुकर से लिपट गया और जोर-जोर से रोने लगा.
“क्या हुआ?”
बिल्लू ने जवाब नहीं दिया. उसका रोना जारी था. कुकुर ने दो-तीन बार पूछा. फिर बिल्लू, कुकुर से अलग हुआ और आंसू पोंछते हुए बोला...
“आज पहली बार मैंने अपने पापा को देखा...तू बहुत अच्छा दोस्त है”
इतना सुनते ही कुकुर जोर-जोर से हंसने लगा.
“क्या हुआ?...हँस क्यूँ रहा है?”
कुकुर अपना पेट पकड़कर हँस रहा था.
“बोल ना...क्या हुआ?”
“तू तो मेरा नाम भी नहीं जानता और ना मैं तेरा नाम जानता हूँ, फिर भी मुझे बहुत अच्छा दोस्त बना दिया”
“बिल्लू नाम हैं मेरा और तेरा?”-बिल्लू मुकुराते हुए बोला.
“कुकुर”
“यह कैसा नाम है?”
“पता नहीं...चल अब सो जाते है”
“मेरा बिस्तर तो नीचे है”
“कोई बात नहीं, आज मेरे बिस्तर पे ही सो जा, आखिर मैं तेरा बहुत अच्छा दोस्त जो हूँ”
दोनों बिस्तर पर लेट गये. कुकुर को तो नींद भी आ गयी, लेकिन बिल्लू अभी भी अपने पापा को देख रहा था.
उसके बाद से दोनों बहुत अच्छे दोस्त बन गये. सुबह-शाम हर वक्त साथ घूमते, साथ खाते. हर रात को छत पर बैठे, तारों में अपने रिश्तेदारों को ढूंढते रहते. ऐसा करते-करते उन्होंने अपने पूरा परिवार का पता लगा दिया. छत के ऊपर जितने भी तारे दिख रहे थे, वो सब कुकुर-बिल्लू के रिश्तेदार थे. बिल्लू, कुकुर का कर्जदार था कि कुकुर ने उसे अनाथ होने से बचा दिया. कुकुर की तरह अब बिल्लू भी अनाथ नहीं रहा.
एक दिन शाम को बिल्लू गलियारे से होकर गुजर रहा था. तभी उसकी नजर चपरासी की कुर्सी पर पड़ी किताब पर गयी. उसने उस किताब को उठाया और बीच में से खोलकर कुछ पढना शुरू किया. कुछ पंक्तिया पढ़ी ही थी कि उसके हाथ से किताब छुटकर फर्श पर जा गिरी. वो गुस्से में लाल-पीला होने लगा. वहां से गुस्से में भागकर मैदान में आ पहुंचा, जहाँ कुकुर फुटबॉल खेल रहा था.
बिल्लू ने भागते हुए आकर कुकुर को पीछे से धक्का मारा. कुकुर मुंह के बल ज़मीन पर जा गिरा.
“झूठा है तू, बहुत बड़ा झूठा है, तुमने मुझसे सब झूठ कहा”-बिल्लू चिल्लाया.
कुकुर चकित–सा खड़ा हुआ. उसे कुछ समझ में नहीं आया की अचानक बिल्लू को हुआ क्या?
“क्या हुआ तुझे?”
“तेरे जैसा झूठा मैंने आज दिन तक कहीं देखा”
“हुआ क्या?, बता ना”
“तुने मुझे झूठी कहानी सुनाई...सारी बातें मुझसे झूठ कही”-और बिल्लू रोने लगा गया.
“मैंने कब झूठ बोला तेरे से?”
“चल मेरे साथ”-बिल्लू, कुकुर का हाथ खींचते हुए उसे गलियारे में चपरासी की कुर्सी के वहां ले आया.
चपरासी अभी भी वहां मौजूद नहीं था. किताब अभी भी फर्श पर ही गिरी पड़ी थी. बिल्लू ने किताब उठाकर कुकुर के हाथ में थमाई. बिल्लू अभी भी बहुत गुस्से में था. उसने कुकुर को पन्ना खोलकर दिखाया जो उसने कुछ देर पहले पढ़ा था. किताब में पंक्तियाँ पढ़ते ही कुकुर की आँखें गम और निराशा में डूब गई.
झूठा”-बिल्लू, कुकुर की छाती पर अपने दोनों हाथों से धक्का देते हुए वहां से चला गया.
किताब को कुर्सी पर रखकर कुकुर उदासी में डूबा गलियारे से धीरे-धीरे गुजर रहा था. तभी उसके कानो में कमला दीदी के गुनगुनाने की आवाज सुनाई पड़ी. कुकुर रुका व उसने गुस्से में कमरे की तरफ देखा. कमला दीदी कमरे के भीतर पोंछा लगा रही थी. कुकुर तेजी से कमरे के भीतर गया और पानी से भरी बाल्टी को लात मार दी.
दिमाग से पैदल हो गया है क्या?”-कमला चिल्लाई.
          कुकुर कुछ पल वहीँ खड़ा बहते पानी को गुस्से में घूरता रहा. फिर वहां से भाग गया. सबसे पहले मैदान में जाकर पत्थरों से अपनी नेकर का जेब भरा, फिर गलियारे से होते हुए सीढियां चढ़ छत पर पहुंचा. कड़कती धूप में कुकुर का चेहरा और ज्यादा लाल-पीला दिख रहा था. वो इधर-उधर घूम-घूमकर आसमान को देख रहा था. फिर छत की पाल पर जाकर बैठ आसमान को घूरने लगा. उसे इंतज़ार था तारों के लौट आने का. पूरे दिन वो धूप में वहीं पाल पर बैठ रहा.
           दोपहर गई, शाम आई, शाम के अलविदा कहते कहते-कहते तारोँ ने दस्तक देनी शुरू की. कुकुर का गुस्सा फुटा और फुट-फुटकर रोने लगा. रोते-रोते पाल से नीचे उतरा और जेब में से पत्थर निकाले और गुस्से में आसमान की तरफ फेंकने लगा. एक-एक करके सारे पत्थर फेंक आसमान की तरफ फेंके. सारे पत्थर फेंकने के बाद आंसू पोंछते हुए सीढियां उतरा. नीचे आकर वो एक बड़े से हॉल में घुसा. बहुत सारे पलंग बिछे थे, कुछ बच्चे सो रहे थे , तो कुछ खेल रहे थे. कुकुर, बिल्लू के पास गया जो पलंग पर लेटा था. कुकुर को अपनी की तरफ आते देख उसने दूसरी तरफ मुंह फेर लिया.
“तुने पूछा था ना कि ...मैं अनाथ हूँ क्या?...हाँ, मैं अनाथ हूँ”
बिल्लू ने कुकुर की बात कोई जवाब नहीं दिया. कुकुर चुपचाप वहां से चल दिया. उसके कानों में अभी भी उस किताब की पंक्तियाँ गूंज रही थी....
तारोँ  की रोशनी को धरती तक पहुँचने में लगभग चार साल से भी ज्यादा का वक्त लगता है, इसलिए रात में हमें जो तारे दिखाई पड़ते है, वे चार साल या उससे ज्यादा साल पहले वहां थे, अब नहीं है. यह रात बड़ी झूठी है, तारें बिल्कुल झूठे है”