रविवार की सुबह की तकरीबन 8 बज रही थी. सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. पवन गुप्ता हर रोज की भांति उस सुबह भी 4 किलोमीटर घुमने के बाद बिल्डिंग के गार्डन की एक बेंच पर आकर बैंठे, पैर पर पैर रखे, अपने हाथ दोनों दिशाओ में फैलाए. एक ढीली सी बड़ी नेकर और टी-शर्ट पहने, गले में मोबाइल लटका हुआ, आँखों पर गोल्डन फ्रेम का चश्मा, ज़िन्दगी के 74 बसंत देख चुके गुप्ताजी की यह मोर्निंग वेशभूषा थी. तभी उनकी नजर गार्डन में खेल रहे दो छोटे बच्चो पर पड़ी. लड़की मुंह फुलाए मिट्टी में चुपचाप बैठी थी और और लड़के उसे अपने साथ खेलने के लिए मना रहा था. अगले ही पल गुप्ताजी हवा के एक तेज झोंके के साथ अतीत की यादोँ में खेल रहे थे....
         9 साल का पवन, 7 साल की आकांशा को अपने साथ खेलने के लिए मना रहा था.
प्लीज खेल ना ले मेले साथआकांशा के सामने पैरो के बल बैठा था पवन.
आकांशा अपना निचला होंठ ऊपर वाले होंठ से थोडा ज्यादा बाहर निकाल गर्दन हिला के मन कर दिया.
क्या ना ले, आज के बाद कभी झगला नहीं कलूंगा, प्लोमिसपवन ने कान पकड़ लिए थे.
तूने तो पीतली बार भी ऐता ही बोला टाआकांशा के गाल गुस्से में लाल होने लगे थे.
तो मैंने तहा ना की घल-घल में मेरे चॉकलेट्स की दूकान होंगी और तू घल पे खाना बनाएंगी
नहीं मैं घल पे खाना नहीं बनाउंगी, मैं ऑफित जाउंगी
2-3 दिन की तो बात हैं बना ले ना फिर तो मैं तो मैं तला जाऊँगापवन की आँखें उदासी में छोटी हो   गयी थी.
त्यूं फिल किसी औल के साथ खेलेंगा घल-घलआकांशा का गुस्सा चुमंतर होकर भावहीन हो चुका था.
मेरे पापा अब तहीं औल ताम तलेंगे तो हम सब जा लहे हैं यहाँ से
तभी पवन की मम्मी ने पवन को खाना खाने के लिए आवाज दी.
तल घल चलते हैं
दोनों एक-दुसरे का हाथ पकडे बिल्डिंग के भीतर पहुंचे. पवन और आकांशा का फ्लैट एक दुसरे के पास ही था. फ्लैट के बाहर पहुँचते ही आकांशा ने पवन का हाथ छोड़ दिया. आकांशा अपने फ्लैट की और बढने लगी.
ऑय, इधल वापस आपवन ने आकांशा को पीछे से आवाज दी.
आकांशा वापस मुड़ पवन के पास लौटी.
बोल, त्यां हुआ
कुछ नहींऔर बिना पलक झपकने के अंतराल में ही आकांशा के गालो पर किस कर पवन अपने फ्लैट के भीतर भाग गया.

वक्त आ चुका था पवन के जाने का. उनका सारा सामन फ्लैट से बाहर नीचे ट्रक में रखा जा रहा
था. पवन उछल-कूद किए हर सामान के साथ-साथ नीचे ट्रक तक जा रहा था, फिर वापस ऊपर. आकांशा अपने फ्लैट के दरवाजे के पीछे छुपी पवन को नीचे जाते देख रही थी. उसके मासूम चेहरे पे उदासी बिना काले बादलो के जैसी थी जो जल्दी ही बरसने वाले थे. जब पवन नीचे ट्रक तक पहुँचता तो आकांशा खिड़की से उसे देखती, फिर वापस दरवाजे के पीछे छुपकर.
पवन और उसका परिवार रवाना हुआ तब आकांशा के माता-पिता बिल्डिंग के नीचे तक टैक्सी तक गये लेकिन आकांशा लिफ्ट पास खड़ी पवन की तरफ देख रही थी. आकांशा अपने कमरे में अकेली बैठी गुडिया से जबरदस्ती खेलने की कोशिश कर रही थी. उसकी माँ रसोई में खाना बना रही थी, तभी आकांशा अपनी माँ के पास पहुंचकर उनका सलवार खींचने लगी.
क्या हुआ बेटाजी?उसकी माँ ने आकांशा की तरफ न देखे अपने काम में व्यस्त ही पूछा.
मम्मा मेली आँखों चे पानी क्यूँ आ लहा हैंरुआंसी आवाज में जवाब दिया.
इतना सुनते ही उसकी माँ ने तनिक ही उसकी तरफ देखा. आकांशा की आँखें लाल हो गयी थी और गाल पे आंसुओ के रास्ते बन गये थे.
क्या हुआ बेटाजी आप रो क्यूँ रहे हो?माँ ने आकांशा को उठाकर सीने से लगा दिया. आकांशा ने कसकर अपनी माँ को पकड़ रखा था.
मम्मा, मैं पवन चे झगला करती हूँ इसलिए वो चल गया ना मुझे छोडकरऔर अपनी आँखें बंद करते ही बुँदे किनारों से निकल फर्श पर जा गिरी.
दोपहर की 12 बज रही थी. गुप्ताजी अपनी कोई किताब ढूँढ रहे थे, तभी उनके हाथ में किसी की शादी का कार्ड आया.... कार्ड देखते ही उनके होंठो पर एक लम्बी मुस्कुराहट छा गयी....
8 साल के बाद....
17 साल का पवन अपने मम्मी-पापा के साथ एक शादी में शिरकत करने पहुंचा था. उसी शादी में आकांशा(15 साल) का परिवार भी शरीक हुआ था. दोनों के परिवार आपस में मिलने में मशगुल थे, लेकिन पवन की नजरे आकांशा को ढूँढ रही थी.
तभी उसे आकांशा दिखाई दी. रिसेप्शन में लगी कुर्सियों की कतार में तीसरी लाइन में बैंठी थी. पवन धीमी आहट भरे कदमों से उसके पीछे की तरफ बढ़ने लगा. उसके करीब पहुँचते ही उसकी आँखों पर अपने हाथ रख दिए.
बता, कौन?पवन ने उत्सुकता से पूछा.
कैसा हैं तू?आकांशा की प्यारी सी आवाज ने पवन की उत्सुकता को बंद अँधेरे कमरे में धकेल दिया.
पवन अचंभित होते हुए अपने हाथ उसकी आँखों पर से हटा उसके सामने आया.
तुझे कैसे पता, मैं ही हूँ?
बस पता चल जाता हैंअपने दुप्पटे को ऊपर की तरफ अभिमानस्वरूप खींचते हुए बोली.
चल अब हाथ तो मिला ले, इतना भी क्या भाव खा रही हैंपवन ने अपना हाथ आगे किया.
नहीं मिलाना मुझे, तू मुझे अकेला छोड़कर चल गया था नागुस्से में अपनी भौंहे चढाते हुए कहा.
आकांशा उठकर वहाँ से जाने लगी. पवन उसके पीछे-पीछे. वो उसे मना रहा था और वो नहीं मान रही थी. पवन उसके लिए आइस-क्रीम, जूस लाकर दे रहा था. आकांशा वो सब ले लेती पर हाथ नही मिलाना था उसे. पूरा वक़्त यूँही बीत गया, आकांशा को रूठने में मजा आ रहा था और पवन को मनाने में.
फिर से जुदा होने का वक़्त आ गया था. दोनों परिवार एक-दुसरे से विदा ले रहा था, लेकिन पवन और आकांशा एक-दुसरे की उदासी में डूबी आँखों में देख रहे थे. तभी अचानक आकांशा ने पवन का हाथ पकड़ सबकी निगाहों से दूर सुनसान अँधेरे में ले आई.
क्या हुआ?
तुझे माफ़ करना था
तो सबके सामने ही कर....
पवन अपनी बात पूरी करता उससे पहले ही आकंशा अपने होंठ उसके होंठ पर रख दिए. एक छोटे से किस के बाद आकांशा वहाँ से भाग गयी. पवन चकित-सा उसे जाते हुए देख रहा था.

4 बज रही थी. गुप्ताजी एक छोटी नींद से जग चुके थे. उनके पलंग के पास ही रखे एक छोटे टेबल पर रखा एक चाय का कप....गुप्ताजी ने उसकी तरफ देखा और अपना हाथ बढाया....
6 साल बाद....
आकांशा की माँ सबको चाय परोस रही थी. पवन(23 साल) और आकांशा(21 साल) का परिवार दुबारा पडौसी बन चुके थे. पवन और आकांशा के पिता दोनों ने पार्टनरशिप में एक बिज़नस शुरू किया था. सब हंसी-मजाक में आनंदमय थे, वहीँ पवन आकांशा को इशारा कर अंदर कमरे में आने को कह रहा था.
पवन और आकांशा रोमांस का कोई भी मौका नहीं गंवाना चाहते थे, बस जब भी मौका मिलता शुरू हो जाते.

एक शाम दोनों छत पर एक-दुसरे की बांहों में बांहे डाले बैठे थे. पवन, आकांशा को किस करना चाहता था लेकिन आकांशा अपना चेहरा उसके होंठो से बचा रही थी साथ ही उसकी मजबूत बांहों से आजाद की हरसंभव कोशिश में लगी थी. आखिरकार वो सफल हुई. वो बिल्डिंग की सीढियों की तरफ भागी. पवन उसके पीछें. आकांशा भागते हुए सीढियों से नीचे उतर रही थी तभी उसका पैर चुका, वो सीढियों से गिरते सीर-मुंह-पेट के बल सामने लिफ्ट से जा टकराई. पवन स्तब्ध रह गया. उसके सीर व मुंह से खून निकल रहा था और वो फर्श पर अचेत पड़ी थी.
हॉस्पिटल में सब परेशान दुआओं में लगे थे. उसके उपचार के बाद डॉक्टर ने बताया की वो खतरे से बाहर हैं एक घंटे में होश आ जायेंगा लेकिन पेट पर गहरी चोट के कारण वो कभी माँ नही बन पाएंगी, बच्चादानी डैमेज हो गयी. होश आ जाने के बाद भी सब उदास थे.
वक़्त बीत रहा था, लेकिन आकांशा अब पहले जैसे नहीं रही थी. माँ न बनने पाने के बुरे ख्वाब से उसके मन को गहरा आघात पहुंचा था. पवन हर वक़्त उसकी केयर करता था. वो उसे शाम को बाहर गार्डन में घुमाने ले जाता. उसे हमेशा हंसाने की कोशिश करता. जितना हो सकता था उतना वक़्त उसके साथ बिताता. आकांशा अब और भी अकेली हो गयी थी. आकांशा के माता-पिता को हर वक़्त एक ही फिकर सताती रहती थी की उसकी बाँझ बेटी से कौन शादी करेंगा?
एक दिन ऑफिस में पवन और आकांशा के पिता कुछ फाइल्स के बारे में बातचीत कर रहे थे.
क्या हुआ..तू परेशान दिख रहा हैंपवन के पिता ने आकांशा के पिता से पूछा.
हाँ यार, आकांशा के कारण
मैं समझता हूँ वो बड़े मुश्किल दौर से गुजर रही हैं, सब ठीक जायेंगा यार, तू टेंशन मत ले, मैं हूँ ना हर वक़्त तेरे साथ
शुक्रिया, पर मुझे फिकर इस बात की हैं वो ज़िन्दगी भर कुंवारी ना रह जाएआँखें गीली होने लगी थी.
अरे एक से एक अच्छा लड़का ढूँढ कर लेकर आऊंगा अपनी आकांशा बेटी के लिएआँखें पोंछते हुए धीरज बंधाया.
मैं सोच रहा था क्यूँ न हम अपनी दोस्ती, रिश्तेदारी में बदल ले
पवन के पिता के हाथ आकांशा के पिता के आंसू पोंछते-पोंछते रुक गये.
मैं एक से एक अच्छा लड़का दिखा दूंगा लेकिन माफ़ करना, मैं अपने बेटे पवन की शादी आकांशा से नही करा सकता
प्रॉब्लम क्या हैं यार वो दोनों बचपन से एक दुसरे को जानते हैं, हम जानते हैं एक-दुसरे को
प्रॉब्लम हैं, मुझे दादा बनना हैं
आखिर सच जुबान पे आ ही गया ना और तू मदद की बड़ी-बड़ी बातें करता हैं
हाँ तो मैं भी हर एक नॉर्मल इंसान की तरह अपने बेटे की शादी बाँझ से नहीं करा सकता
अपनी बेटी के बारे में बाँझ शब्द सुनते ही आकांशा के पिता हाथापाई पर उतर आये. मामला बिगड़ चुका था, दोनों की दोस्ती में शिगाफ(दरार) आ चुका थी. दोनों ने बिज़नस पार्टनरशिप तोड़ दी थी. आकांशा का परिवार शहर छोड़कर जाने वाला था. आकांशा और पवन दोनों मिलकर मामला सुलझाने की हरसंभव कोशिश में लगे थे पर नाकाम रहे.
2-3 दिन तक दोनों को एक दुसरे से मिलने, बात करने का मौका नहीं मिला. एक दिन पवन बाजार से सब्जी लेकर लौटा था.
पापा, आकांशा कहाँ गयी, थोड़ी देर पहले तो घर पे ही थे, घर पे ताला कैसे हैं
जहाँ जाना था वहाँ चले गये, तुझे फिकर करने की जरुरत नहीं हैं
मैं आकांशा से प्यार करता हूँ, शादी करना चाहता हूँ
भाड में गया तेरा प्यार, वो बाँझ अपने घर की बहु कभी नही बनेगी
लेकिन मैंने प्यार सिर्फ उससे किया हैं और मैं शादी भी उसी से करूँगा
तो इस घर की तरफ कभी मुड़ कर भी मत देखना’   
पवन ने घर से बाहर आकर पड़ोस की दुकान पर पूछा तो उन्होंने बताया की वो अभी रेलवे स्टेशन की तरफ गये हैं. वो अपनी साइकिल लेकर रेलवे स्टेशन की तरफ भागा. जितनी रफ़्तार से जा सकता था उतनी रफ़्तार से वो स्टेशन पहुंचा. साइकिल को बिना पार्क किए सड़क पे गिरा छोड़ स्टेशन के भीतर भागा. प्लेटफार्म वीरान पड़ा था, ट्रैक पर उडती हल्की-हल्की धुल ज़मीन से मिलाप कर रही थी. ट्रेन उससे, स्टेशन से, शहर से, उसके दिल से दूर जा रही थी.

रात की 12 बजने में चंद सेकंड्स बचे थे. गुप्ताजी आराम कुर्सी पर आराम फरमा रहे थे. तभी दो दुबले पतले से कोमल से हाथो ने उनकी आँखों को छुपा दिया. किसी के होंठ उनके कानो के करीब आकर फुस्स्फुसाने लगे....
शादी की पचासवीं सालगिरह मुबारक हो
आपको भीगुप्ताजी मुस्कुराने लगे.
उन होंठो ने गुप्ताजी के गालो को चूम लिया.
मैं आज पुरे दिन इन चुम्मो को ही याद कर रहा था
क्या बात हैं, आज भी रोमांटिक मिजाज न बदला आपका
हम्मम्म, सोच रहा था अगर वो ट्रेन उस दिन सच में निकल गयी होती तो
ट्रेन तो निकल ही गयी थी बस मैंने मम्मी-पापा को मना लिया था की सिर्फ एक बार वो तुमसे मिल ले
मिसेस आकांशा गुप्ता ने अपने हाथ मिस्टर पवन गुप्ता की आँखों से हटा दिए. गुप्ताजी उठे और आकांशा की तरफ मुड़े, अगले ही पल दोनों एक दुसरे के करीब आते-आते एक दुसरे में सिमट गयें. उनके पीछे की दीवार पे एक पेंटिंग पे कुछ लाइन्स....

love is..
Running into his arms,
Colliding with his heart,
And exploring into his soul!”