कभी धीरे कभी तेज़ होते शोर से मेरी नींद टूट गयी. घडी की तरफ देखा तो घंटे की सुई चार पर थी, मिनट की सुई 9 पर, सेकंड की सुई तेजी से वक़्त को शाम की तरफ धकेल रही थी. उठने की इच्छा तो न थी, पर शोर आखिर चीज़ का था यह जाने की जिज्ञासा ने जेहन के भीतर अचानक ही उर्जा भर दी. लडखडाते कदमो से कमरे के बाहर आकर, अधखुली आँखों से छत से नीचे देखा तो होंठो पर हल्की मुस्कान लौट आई. वहीँ रोज का झमेला, वजह सिर्फ एक ही बाबू अंकल और उनका रिक्शा....
हरामखोर तेरे कुत्ते को समझा दे मेरे रिक्शे के पहिये पर दुबारा अपनी टांग ऊँची कर मूत के चला गयाबाबू अंकल सामने वाले रहमान चचा के शर्ट की कॉलर पकडे खड़े थे.
बाबू भाई समझने की कोशिश करो, कुत्ते हैं इंसान तो नहीं ना, जो समझाने पर समझ जाएरहमान चचा दबी आवाज में अपनी राय जाहिर की.
वो मुझे नहीं पता, जैसे समझाना हैं वैसे समझा वरना काट दूंगा, फिर तेरा कुत्ता दुसरो का देखता फिरेगाबाबू अंकल ने आखिरी चेतावनी के साथ शर्ट का कॉलर छोड़ दिया.
                   बच्चो के लिए बाबू अंकल, लेकिन पूरा नाम बाबू हरि सिंह. उम्र करीब 60 के पार, सीर पर सफेदी, कद 5 फीट, आँखों में दबंगई, सफ़ेद पायजामा, सादी कमीज रोज की वेशभूषा. एक छोटे से जर्जर मकान में अकेले रहते थे. एकलौते बेटे ने तो कब का उनका साथ छोड़ दिया, जब वो बाप बना तो अपने बाप को भूल गया. अपने बेटे के दूर जाने का गम उनकी धर्मपत्नी सविता न सह सकी और बाबू अंकल से किए सात जन्मो के सफ़र का वादा पहले जन्म में ही तोड़ चल बसी.

                   सब आये और चल दिए लेकिन एक चीज़ थी जो आज भी उनका हमसफ़र बने हुए थी उनका ‘रिक्शा’. उनके पिता अब्दुल शरीफ नाम की शख्सियत के लिए भाड़े पर रिक्शा चलाते थे. बाबू अंकल भी कहीं बार अपने पिता के साथ जाया करते थे, बस यहीं से शुरू हुआ उनका ‘रिक्शा-प्रेम’. फिर देर रात उनके पिता घर आते ही बाबू अंकल को रिक्शा में बिठाकर गली का चक्कर नहीं कटाते तब तक वो सोते नहीं थे. वक़्त बीतते पता ही नहीं चला कब बाबू अंकल ने 18 बसंत देख लिए.
                   एक काली रात की दुखद घटना ने बाबू अंकल के जेहन को अँधेरी काली
रातो में धकेल दिया. गुरूवार था उस दिन, बाबू अंकल को हल्का सा बुखार था, तो वे अपने माता-पिता के साथ साईं-मंदिर दर्शन करने नहीं गये. उनके माता-पिता कभी वापस ना लौटे, सड़क हादसे में उनकी मौत हो गयी. उस रात हल्के बुखार की गरमाहट ने आज भी बाबू अंकल के जेहन से विदा न ली.
                   अपने पिता से रिक्शा चलाना वे पहले ही सीख चुके थे, इसलिए अब्दुल शरीफ ने उन्हें रिक्शा चलाने के काम पर रख दिया. यहाँ से शुरू हुआ उनका रिक्शा संग सफ़र. अगले 10 साल तक हर रात बाबू अंकल रिक्शा में ही सोये. अपने माता-पिता संग बचपन की यादों से घिरी दीवारे उन्हें काटने दौड़ती थी. एक रात भी ऐसी ना बीती जब वो रिक्शे में बैठे-लेटे रोये ना हो. उनकी रोई आँखे देख रिक्शे की हेडलाइटे भी नम हो गयी. यह रिक्शा ही था जो बाबू अंकल को उनके अकेलेपन का एहसास न होने देता था. रिक्शे की भीतरी सतहे हर पल उन्हें मुस्कुराने में लगी रहती थी.
                    जल्दी ही उनका अकेलापन दूर हो गया. दूर के रिश्तेदारों ने उनकी शादी घरेलु-खानदानी लड़की सविता से करवा दी. रिक्शा में अपने पैर पर पैर रखे लेटे बाबू अंकल सामने आसमान के सितारों की चकाचौंध में अपनी हनीमून की रात याद करते रहते थे. उन्होंने अपना हनीमून इसी रिक्शे में मनाया था. रिक्शे को फूलो से सजाकर एक ऊँची जगह पर सुनसान माहौल में जिसके आगे की तरफ नीचे खायी में नदी जो की मोहब्बत के गीत गाये बह रही थी. आसमान में जगमगाते सितारे हरसंभव कोशिश कर रहे थे रिक्शे के भीतर झाँकने की. उसके बाद तो वो जगह उनके लिए पिकनिक स्पॉट बन गया, महीने की बहुत सी राते वो यहीं बिताया करते थे. बाबू अंकल ने अपने इकट्ठे किए कुछ रूपये और उधार लाये रूपये मिलकर अब्दुल शरीफ से वो रिक्शा खरीद लिया. फिर उन्हें प्राइवेट स्कूल के छोटे बच्चो को लाने ले जाने का काम मिल गया. ज़िन्दगी खुशहाली भरे तेवर दिखा रही थी. जल्द ही घर में एक नये मेहमान ने प्रवेश कर लिया. बाबू अंकल पिता बन गये. सविता ने लड़के को जन्म दिया.
                    बदलते मौसम के साथ लड़का बड़ा हुआ. उसकी शादी के वक़्त बाबू अंकल एक बात पर अटक गये की उनका लड़का उनके रिक्शे में बैठकर ही बारात लेकर जायेंगा. रिश्तेदारों ने समझाया की रिक्शे में दूल्हा जायेंगा तो अच्छा नहीं लगेगा, कितनी बेईज्ज़ती होंगी? बेईज्ज़ती शब्द सुनते ही बाबू अंकल तिलमिला गये, रिश्तेदारों पर बरस गये की उनका रिक्शा कभी उनकी बेईज्ज़ती नहीं करायेंगा. आखिरकार सविता के समझाने पर वो माने वरना शायद उनका लड़का पहला दूल्हा होता जो दुल्हनियाँ लेने रिक्शा में जाता. धूमधाम से शादी संपन्न हुई. घर की दीवारे फिर से खुशियों से जगमगा रही थी. लेकिन वो कहते हैं ना की ईश्वर ने सूख-दुःख सबको बराबर हिस्सो में बाँट रखे हैं. पुराने दिन फिर लौट आये थे, बाबू अंकल फिर से अकेलेपन की दुनिया में लौट आये. बेटे ने घर छोड़ दिया और पत्नी ने दुनिया.
                     वो दिन मुझे आज भी याद हैं, शाम का वक़्त हो रहा था, बाबू अंकल रिक्शे में बैठे अपने ही मस्ती में खोये हुए थे. गली में आया हुआ एक ट्रक उनके रिक्शे के पास से गुजर रहा था की ट्रक का पिछला हिस्सा, रिक्शे के पिछले हिस्से से जा लगा. तपाक से बाबू अंकल अंगारे भरी आँखें लिए रिक्शे से उतरे, ठीक वैसे ही जैसे किसी सांप की पूंछ पर पैर रख दिया हो.
माफ़ करना अंकलट्रक में बैठा लड़का अपराधिक स्वर में बोला.
बाबू अंकल कहाँ सुनने वाले थे उसकी, उसकी शर्ट पकड़ ट्रक से नीचे उतार दिया और उसकी पिटाई वहीँ शुरू कर दी. सारा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया था. ट्रक का ड्राईवर आकर छुड़ाने लगा पर दो थप्पड़ उसको भी मिले. मैं हैरान चकित सा समझ नहीं पा रहा था की आखिर इतना जोश इस उम्र में एक रिक्शे के खातिर. तभी अचानक ही बाबू अंकल बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़े. वहाँ उपस्थित सभी लोगो के चहरे पे परेशानी लकीरे उमड़ने लगी थी. एम्बुलेंस बुलाकर उन्हें जल्द ही हॉस्पिटल भेज दिया गया.
उनके बेटे को भी हॉस्पिटल बुला दिया गया. डॉक्टर ने उनके बेटे से कहा की उन्हें हल्का सा हार्ट अटैक आया हैं. छोटा सा ऑपरेशन करना पड़ेंगा आप काउंटर पर कुछ फॉर्मेलिटी पूरी कर लो और रूपये जमा करा दो.
ऑपरेशन सफल हुआ. रहमान चचा और बाकी मोहल्ले वाले बाहर बाबू अंकल के होश में आने का इंतज़ार कर रहे थे लेकिन उनका बीटा जा चुका था.
रहमान चचा थोड़े चिंतित दिखाई दे रहे थे.
क्या हुआ मियां इतना भी परेशां मत हो, जल्द ही आ जायेंगा होशगली के एक अंकल ने उन्हें धीरज बंधाया.
सोच रहा हूँ जब होश आयेंगा तो उन्हें सच कैसे बताऊंगा?रहमान चचा सीर पर हाथ रखते बोले.
कुछ ही घंटो बाद बाबू अंकल को होश आ गया. पास ही रखी मशीन दिखा रही थी की हार्ट-बीट सामान्य चल रही हैं. मिलने वालो का तांता लग रहा था.
कब तक छुट्टी मिल जायेंगीबाबू अंकल ने धीरे से बोले.
बस 4-5 दिन की बात हैंरहमान चचा ने हाथ थामते हुए बोले.
रहमान भाई मेरे रिक्शे का ख्याल रखना
आपको एक बात बतानी थी बाबु भाई, थोडा धीरज रखना
क्या हुआ बोलो?हल्के से परेशानी के भाव दिखाई पड़े.
आपका एक छोटा सा ऑपरेशन हुआ हैं....उसके लिए कुछ रुपयों की जरुरत थी....आपका बेटा आया था....मैंने तो बहुत समझाया उसे पर....
पर क्या रहमान भाई?
आपके ऑपरेशन के लिए....रुपयों का बंदोबस्त....करने के लिए....आपका रिक्शा आपके बेटे ने बेच दिया
बाबू भाई स्तब्ध हो गये. मानो जान ही ना हो उनके अंदर. आँखे के दिए अचानक ही छोटे हो गये.
उस कुत्ते ने पहले सविता को मुझसे छीना, मुझसे मेरी खुशियां छीनी और अब मेरा रिक्शा, एक आखिरी तो सहारा था मेरा वो रिक्शा और वो भी, उस हरामी को मैं छोडूंगा नहींधीरे- धीरे आगबबुला होने लगे और पलंग से उठने लगे अपने बेटे से मिलने जाने के लिए.
लोगो ने समझा बुझाकर वापस लेटाया. माहौल काफी देर के लिए शांत हो गया. बाबू भाई एक दम स्थिर छत से जुड़े चलते पंखें को देखे जा रहे थे. काफी देर उसे घूरने के बाद अपनी आँखें बंद की और बुँदे छोटी-सी लहरों के रूप में गालो पे दौड़ने लगी.       
और फिर मशीन ने हार्ट-बीट को तेजी से गिरते दिखाना शुरू  किया.....90....77....63....49....31....20....7....2....बीप....बीप....बीप....बीप....बीप...
मैंने हीर-रांझा, सोनी-मेहवाल, मिर्जा-ग़ालिब, रोमिओ-जुलिअट बहुत सी प्रेम कहानियाँ सुनी थी लेकिन यह कुछ अलग तरह का ही प्रेम था....रिक्शा-प्रेम....रिक्शा-बाबू....