७-८ अप्रैल २०१२ की मध्यरात्रि को मैं कभी नही भूल सकता| मैं और विजेन्द्र भैया बाइक लेकर माउंट-आबू घुमने गये थे| आबुरोड से २६ किलोमीटर की चढाई और फिर राजस्थान की सबसे खूबसूरत जगह| पूरी दिन भर मौज मस्ती के बाद, रात की तक़रीबन ११:३० बजे मैं, भैया और भैया के कुछ दोस्त(महेन्द्र सिंह, जीतू, सुनील, आदित्य, एक-दो और भी ठीक से नाम याद नही) शहर के एक कोने से जुडी सड़क पर बाइक पर बैठे थे|

महेन्द्र सिंह(विजेन्द्र भैया से)- तो भयु आज रात तो तू यही रुकेगा|
विजेन्द्र- रुकने की इच्छा तो बहुत है लेकिन मुझे सुबह ९ बजे शिवगंज में एक मीटिंग अटैंड करनी हैं,       इसलिए अभी निकलना पड़ेगा|
महेन्द्र सिंह- भयु रुक जा यार|
जीतू- हाँ भाई आज रात रुक जाओ यहीं पे|
भैया मेरी तरफ देखते है|
मैं- भाई रुक जाते है यहीं पे, वैसे भी ३-४ घंटे की ड्राइविंग है और रात का टाइम, नेशनल हाईवे १४, डेंजरस, फ़ालतू की रिस्क नही लेते हैं|
विजेन्द्र- अरे चलते है कुछ नही होगा, मीटिंग ज्यादा इम्पोर्टेन्ट है, पापा को पता चल गया की मैंने अटैंड नही की तो शक हो जाएगा की हम घर पर नही थे|
सुनील- रुक जा भाई, कभी कभी तो आता हैं, उसमे भी जाऊ जाऊ|
विजेन्द्र- अरे समझा कर यार, जाना जरुरी हैं|
महेन्द्र सिंह- तू पागल हो गया है, तुझे आबुरोड जाने वाले रास्ते के किस्से तो याद हैं ना|
विजेन्द्र- हाँ, याद हहैं|
महेन्द्र- तो फिर|
मैं- कौनसे किस्से?
जीतू- उस रोड पे रात को एक आत्मा दिखायी देती हैं|
मैं- क्या बात करते हो, सच में|
विजेन्द्र- हाँ, एक बार एक लक्सरी बस खायी में गिरी थी, तब से वहाँ पे एक औरत दिखाई देती हैं|
आदित्य- तो फिर क्यूँ जा रहे हो फ़ालतू की रिस्क लेने|
मैं- सच में दिखती हैं या मजाक कर रहे हो सब|
महेन्द्र सिंह- सच में दिखती है, बहुतो को दिख चुकी हैं, सब वहीं पे बेहोश हो गये थे|
सुनील- हाँ, पर किसी को कुछ नुकसान नहीं पहुंचाया|
विजेन्द्र- मेरी गर्लफ्रेंड के घर जो नौकर काम करता हैं उसे भी दिखी थी|
मैं- तब तो भैया चलते है, मुझे भी देखनी हैं, यह आत्मा कैसी होती है, बहुत सुना इसके बारे में, पर कभी देखी नहीं|
महेन्द्र सिंह- तनुज, यह कोई मजाक नहीं हैं|
मैं- भाई, मैं भी मजाक नही कर रहा हूँ, सच में देखनी है मेरे को|
विजेन्द्र- पक्का|
मैं- पक्का भाई, इस पार या उस पार|
हम दोनों रवाना होने से पहले सबसे गले मिलते हैं| सब जने अभी भी उस आत्मा और हमारे रुकने की रट लगाए हुए थे| मैं सुबह से ही रात को वापस लौटने के खिलाफ था क्यूंकि, नेशनल हाईवे १४ राजस्थान का सबसे खतरनाक हाईवे हैं, जहां सबसे ज्यादा एक्सीडेंट होते है, लेकिन आत्मा से मिलने की दिलचस्पी ने मुझे बेख़ौफ़ कर दिया था| रात की करीब सवा १२ बजे हम सारे दोस्तों को अलविदा कह के रवाना होते हैं|
रात को १० बजे के बाद माउंट आबू के एंट्री-एग्जिट गेट पे पुलिस की नाकाबंदी हो जाती हैं| कोई भी वेहिकल माउंट-आबू में एंट्री तो कर सकता हैं लेकिन एग्जिट बहुत मुश्किल| हमारी बाइक को पुलिस वाले रोक देते हैं|
पुलिस- कहाँ रवाना हुए इतनी रात को?
विजेन्द्र- घर|
पुलिस- दिमाग तो ठीक हैं ना, घडी देखी, क्या टाइम हो रहा हैं|
विजेन्द्र- जाना जरुरी है|
पुलिस- कहाँ के हो?
विजेन्द्र- पोसालिया, सिरोही डिस्ट्रिक्ट|
पुलिस- रास्ता कितना खराब हैं, पता हैं ना, वापस जाओ सुबह निकल लेना|
मैं- सरजी, बहुत अर्जेंट हैं|
पुलिस- अरे मान भी जाओ, आधी रात हो चुकी हैं|
काफी मश्शकत के बाद हमे वो जाने की परमिशन देते हैं|
हमे उसे हिल स्टेशन से २६ किलोमीटर नीचे उतरने था आबुरोड के लिए| हमारा सफ़र शुरू हो चुका था|
विजेन्द्र- सुबह आये तब रास्ते पे ऑइल गिरा हुआ था, मुझे याद दिलाना थोड़ी देर बाद|
मैं- ठीक है, गाने चला दु|
विजेन्द्र- हम्म्म|
मेरे दिमाग में केमिकल रिएक्शन शुरू हो चुकी थी की अगर सच में आत्मा आ गयी तो? सफ़र के शुरू होने के ५ मिनट ही बीते थे रास्ते के बायीं तरफ एक हनुमानजी का मंदिर दिखाई पड़ता हैं|
मैं- भाई, दर्शन कर लेते हैं|
भैया मुस्कुराने लगते हैं| वो बाइक रोकते हैं| बाइक से उतरकर हम मंदिर में माथा टेकते हैं और फिर चल पड़ते हैं अपनी मंजिल की तरफ| बाइक मध्यम गति से चल रही थी| 

भैया बार-बार बाइक की हेडलाइट को ऑन-ऑफ ऑन-ऑफ कर रहे थे, उन्हें इस बात का डर था की कहीं रौशनी देखकर कोई जंगली जानवर बाइक के सामने ना आ जाये| मेरे दिमाग में कहीं
सवाल घूम रहे थे, और सब सवालों में एक शब्द मौजूद था....आत्मा| मैं बाइक के पीछे बैठा दायीं-बायीं तरफ देख रहा था, गाने बज रहे थे लेकिन मेरा ध्यान उन गानों से परे था| टेढ़ी मेढ़ी सड़क, सड़क के एक तरफ खायी थी तो, दूसरी तरफ बड़ा सा पहाड़, जिसपे टेढ़े-मेढ़े पेड़ ऐसे खड़े हुए थे जैसे मानो देत्य हो| घना अँधेरा, देत्य रूपी पेड़, एक अजीब सी आहट, और थोड़ी थोड़ी देर से हवा का एक तेज़ झोंका, उन पेड़ो को देखकर मुझे होंटेड मूवी का वो सीन याद आ रहा था जिसमे वो आत्मा एक पेड़ से दुसरे पेड़ हवा में लहराती हुयी हीरो-हीरोइन का पीछा करती हैं| वो सीन सोच-सोच कर में बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था| जैसे जैसे सफ़र आगे बढ़ रहा था, कहीं उट-पटांग सवाल मुझे डर से घेरे हुए थे| मेरे जेहन में एक सवाल बार बार आ रहा था की बस खायी में कहाँ गिरी थी, क्यूंकि जिस जगह बस खायी में गिरी थी उसी जगह पे तो वो औरत दिखेगी| मैं बार बार भैया से यह सवाल पूछने की नाकाम कोशिश कर रहा था, लेकिन मुझे डर था की भैया ड्राइविंग कर रहे हैं, मेरा यह सवाल सुनकर उस औरत के बारे में सोचना शुरू ना कर दे, जिससे कोई अनहोनी ना घट जाए|
                       रात की करीब १:३० बजने आ चुकी थी, हमने लगभग २० किलोमीटर रास्ता पीछे छोड़ दिया था| जैसे-जैसे रास्ता कट रहा था मेरा डर कम होता जा रहा था| अचानक भैया सड़क के किनारे एक रोलिंग के पास बाइक रोकते हैं| मैं आश्चर्यचकित भरी निगाहों से उनकी तरफ देखते हुए बाइक से उतरता हूँ और मोबाइल में गाने बंद करता हूँ| भैया बाइक से उतरकर रोलिंग की तरफ जाते है, नीचे खायी में झांकते है| चारो तरफ शान्ति ही शान्ति| मैं अभी भी आश्चर्यचकित सी निगाहों से उनकी तरफ देख रहा था|
मैं- यहाँ पे क्यूँ रोकी बाइक?
विजेन्द्र- बस ऐसे ही थक गया चलाते चलाते|
मैं- आबुरोड और कितना दूर हैं?
विजेन्द्र- (हाथ से इशारा करके}वो सामने जो लाइटिंग दिख रही हैं ना, वो हैं आबुरोड, सिर्फ ६-७ किलोमीटर दूर|
मैं- तो चलो फिर नीचे जाके ही किसी होटल पे रोकते हैं|
फिर से हम चल पड़ते हैं| धीरे-धीरे मेरे दिलो-दिमाग से आत्मा का चित्र धुंधला होने लगता है और मैं सोच रहा था की यार २० किलोमीटर सफ़र तय कर लिया कोई आई नही अब क्या आएगी? तभी सामने से एक कार हमारे पास से होकर गुजरती हैं| मैं पीछे बैठा कार के शीशे में २-३ सेकंड के लिए ही सही पर झांकता हूँ की काश कोई लड़की अन्दर बैठी दिख जाए| अब मेरे अंदर डर ख़त्म हो चुका था, मेंरे मोबाइल में भाग डी.के.बॉस गाना शुरू होता है, मैं मोबाइल के साथ गुनगुनाने लगा गया था| तभी मेरे दिमाग में फिर से एक मुझे सवाल परेशान करने लगता है की वो आत्मा/औरत आखिर दिखती कहाँ है| मैं भैया से पूछने के लिए अपने होंठ हिलाने ही वाला था की....
                                                   हमारी बाइक से १५ फीट दूर मोड़ पे रोलिंग के पास एक साया दिखाई पड़ता हैं| मैं भी सोचने लगा की आखिर इतनी रात कौन है सड़क पर रोड पे| फिर सोचा शायद टूरिस्ट होगे, अभी थोड़ी देर पहले एक गाडी निकली और कोई गाडी होगी मोड़ के दाहिनी तरफ खडी होगी और टॉयलेट करने के लिए उतरा या उतरी होगी| हम धीरे धीरे उसके करीब जा रहे थे| मेरी नजरे सिर्फ उसपे जमी हुयी थी| हम मोड़ पे उसके काफी करीब पहुँच गये थे| मोड़ पे उसके पास से सिर्फ २ फीट की दुरी से दाहिनी तरफ बाइक मोड़ते हुए हम दोनों उसे देख रहे थे|
                लम्बाई होगी करीब ५ फीट, लाल घाघरा-चोली, जो अँधेरे में गुलाबी जैसा दिख रहा था, उसके चेहरे पे लम्बे-लम्बे बाल बिखरे हुए, बालो की वजह से उसका चेहरा दिखाई नही दिया, वो रोड पे धीरे धीरे अपने कदम आगे बढ़ा रही थी|

 हम दोनों उसे अपनी सामान्य निगाहों के साथ देख रहे थे| मुझे नहीं पता भैया उस वक़्त क्या सोच रहे थे?, लेकिन सच कहू तो मैं उस वक़्त भूल चुका था की इस रोड पे कोई आत्मा दिखाई देती हैं, पता नही क्यूँ?, मैं नहीं जानता| अगले ही पल हम दोनों आगे देखते है और मेरी नजर अपनी दाहिनी तरफ पड़ती है और, दाहिनी तरफ कोई कार नही खड़ी थी, अचानक मेरे दिलोदिमाग में एक शब्द गूंजने लगा था....आत्मा| मैं भैया को कुछ बोलने ही वाला था की....
विजेन्द्र- देखा, देखा, देखा की नही देखा....
मैं- अरे(बीसी), सब देख लिया, तू गाडी भगा|
मैं एक पल के लिए भूल गया था की जो गाडी चला रहे हैं वो मेरे भैया है, मैं उन्हें गाली कैसे दे सकता हूँ? लेकिन वो कहते है ना की जब मस्त वाली फटती हैं तो इंसान भूल जाता हैं, की सिलने के लिए सुई में धागा पिरोये या रस्सी| दरअसल भैया ने पिछली रोलिंग के वहाँ बाइक इसलिए रोकी थी की उन्होंने सोचा की बस इस रोलिंग से खायी में गिरी थी लेकिन वो गलत रोलिंग थी| भैया तेज़ी से बाइक भगा रहे थे, तेजा हवा के झोंके से पत्ते उड़ रहे थे, रात की २ बजे का ठंडा मौसम गर्म सा एहसास हो रहा था, मेरे में इतनी भी हिम्मत नहीं थी की एक बार पलट के पीछे देख लु| मेरी साँसे थम गयी थी या तेज़ हो गयी थी मैं खुद नही जानता था उस वक़्त| मुझे फिर से मूवी का वही सीन याद आ रहा था की कहीं वो पेड़ से पेड़ मेरा पीछा तोह नही कर रही हैं| हमने अगले ५ किलोमीटर सिर्फ ५ मिनट में तय कर लिए थे| हम अबुरोड़ में प्रवेश कर चुके थे| मैं सहमी निगाहों से दायें-बाएँ रोड किनारे बीयर बार देख कर यह सोच रहा था की एक पैग तोह लगान पड़ेगा, वरना नींद नही आएगी आज रात| आबुरोड पहुँच कर हमने एक ढाबे पे बाइक रोकी|
                      ढाबे पे उतरकर मैंने अपना मुंह धोया| भैया आँखों में दवाई डालकर बेंच पे लेट गये| मेरी सहमी शक्ल देखकर ढाबे वाले से रहा नही गया और उसने पूछ ही लिया की क्या हुआ इतना डरा हुआ कैसे है? भैया के चेहरे पे तो जरा सा भी डर का भाव नहीं था| ढाबे वाले को बताया तो उसने भी कहा की सच में वो औरत बहुतो को दिखाई दी है| तभी उस ढाबे पे बैठा एक व्यक्ति ने तो हमारे दिमाग की नसे ही हिला दी वो हमसे कहता है की तुम बहुत तकदीर वाले हो आज उजाले पग की चौदस है, माताजी की दिन, तुम्हे आंबे माता ने दर्शन दिए है. अब वो माता थी या आत्मा और वो तो गणपति बापा ही जाने....
          यह कहानी मैंने बहुतो को सुनाई तो किसी ने भी विश्वास नही किया और शायद आप भी नहीं कर रहे हो, लेकिन यह मेरी सच्ची कहानी हैं| बहुतो ने कहा की तुम्हारे मन का वहम होगा, कोई कहता है कोई औरत लकड़ियाँ लेने आई होगी, लेकिन रात को २ बजे लकड़ियाँ, नो, नेवर और अगर मन का वहम हो तो सिर्फ एक को हो सकता हैं, एक ही वक़्त पे दो लोगो को एक साथ कैसे?
                   आज भी जब वो रात याद आती है तो एक ही बात सोचता हूँ, वो आत्मा थी या माता, एक बार फिर मन में दुबारा वहाँ जाके सच जाने की इच्छा होती हैं और फिर एक ही गाना गुनगुनाने लग जाता हूँ....कैसा यह राज़ है..जो की खुलता नहीं..क्यूँ मेरे ज़ेहन में..तू हैं ए अजनबी..!!!!